News Desk : भारत में जनआंदोलन केवल सड़कों पर भीड़ जुटाने या सरकार के खिलाफ नारे लगाने तक सीमित नहीं रहे हैं। कई आंदोलनों ने सरकारों को अपने फैसले बदलने पर मजबूर किया, कुछ ने कानूनों और नीतियों में बदलाव कराया, जबकि कई बड़े प्रदर्शनों के बावजूद अपनी प्रमुख मांगें पूरी नहीं करा सके। कुछ आंदोलनों का असर तत्काल नहीं दिखा, लेकिन उन्होंने देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श की दिशा बदल दी।
दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे कॉकक्रोच जनता पार्टी (CJP) और विपक्ष के विरोध के बीच भारत के पुराने आंदोलनों की चर्चा फिर महत्वपूर्ण हो गई है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में ऐसे पांच आंदोलनों का जिक्र है, जिन्होंने अपने घोषित उद्देश्यों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की, और पांच ऐसे आंदोलनों का भी, जो बड़े जनसमर्थन के बावजूद अपनी प्रमुख मांगें पूरी नहीं करा सके।
पहले समझिए: CJP का मौजूदा आंदोलन किस मुद्दे पर है?
CJP और विपक्षी दलों के प्रदर्शन का केंद्र मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठे सवाल और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग है। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने पर चिंता जताई है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और भाजपा ने पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि सूची में बदलाव के पीछे वैध कारण हैं।
इससे पहले CJP ने NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन का नेतृत्व किया था। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उस आंदोलन के बाद जुलाई में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। हालांकि, किसी मंत्री के इस्तीफे और आंदोलन की हर मांग पूरी होने को एक ही बात नहीं माना जा सकता।
भारत के पांच आंदोलन, जिन्होंने अपने उद्देश्यों में सफलता हासिल की
1. हिंदी-विरोधी आंदोलन, 1965
1965 में तत्कालीन मद्रास राज्य में हिंदी को लेकर व्यापक विरोध हुआ। प्रदर्शनकारियों को आशंका थी कि केंद्र सरकार के कामकाज में अंग्रेजी की जगह हिंदी को प्राथमिकता दिए जाने से गैर-हिंदी भाषी लोगों के हित प्रभावित होंगे।
छात्रों और विभिन्न संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए। आंदोलन के दबाव और तमिलनाडु के नेताओं की चिंताओं के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आश्वासन दिया कि अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रहेगा और गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी नहीं थोपी जाएगी।
क्या हासिल हुआ? आंदोलन की प्रमुख मांग—हिंदी को अनिवार्य रूप से थोपे जाने की आशंका दूर करना—नीतिगत आश्वासन के जरिए आगे बढ़ी। इसने भाषा और संघीय संबंधों पर राष्ट्रीय बहस को भी प्रभावित किया।
2. जेपी आंदोलन, 1974-75
बिहार में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और खराब प्रशासन के खिलाफ छात्रों के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में व्यापक राजनीतिक अभियान बन गया। उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया और अलग-अलग विचारधाराओं वाले विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने में भूमिका निभाई।
इंदिरा गांधी सरकार ने जून 1975 में आपातकाल लागू कर दिया। जयप्रकाश नारायण समेत कई विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। आंदोलन की तत्काल मांगें पूरी नहीं हुईं, लेकिन इसने विपक्षी एकता को मजबूत किया।
क्या हासिल हुआ? 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। इस लिहाज से आंदोलन का राजनीतिक प्रभाव उसके शुरुआती उद्देश्यों से आगे तक पहुंचा।
3. इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन, 2011
अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुए भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन ने जन लोकपाल कानून की मांग को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी संख्या में लोग जुटे और देश के अन्य शहरों में भी प्रदर्शन हुए। टीवी कवरेज और सोशल मीडिया ने आंदोलन को व्यापक पहचान दिलाई।
सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत की और संसद में उनकी मांगों पर चर्चा हुई। हालांकि, आंदोलनकारियों की मांग के अनुरूप जन लोकपाल कानून उसी रूप में नहीं आया, जिसकी वे अपेक्षा कर रहे थे।
क्या हासिल हुआ? भ्रष्टाचार राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया। आंदोलन ने आम आदमी पार्टी के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की और 2014 के आम चुनाव से पहले राजनीति में महत्वपूर्ण बदलावों में योगदान दिया।
4. निर्भया आंदोलन, 2012-13
दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उसकी मौत के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने महिलाओं की सुरक्षा, दोषियों को सजा और यौन अपराधों से जुड़े कानूनों को सख्त बनाने की मांग की।
सरकार ने न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित की। समिति ने तेजी से अपनी रिपोर्ट दी और इसके बाद आपराधिक कानून में संशोधन किया गया।
क्या हासिल हुआ? आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के जरिए यौन अपराधों की कानूनी परिभाषाओं और कई अपराधों के लिए दंड संबंधी प्रावधानों में बदलाव किए गए। इस आंदोलन ने महिलाओं की सुरक्षा पर देशव्यापी बहस को भी तेज किया।
5. किसान आंदोलन, 2020-21
केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लंबे समय तक आंदोलन किया। उनकी प्रमुख मांगों में तीनों कानूनों को वापस लेना और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी शामिल थी।
केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन सहमति नहीं बन पाई। नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की।
क्या हासिल हुआ? तीनों कानून वापस ले लिए गए, लेकिन MSP की कानूनी गारंटी की मांग पूरी नहीं हुई। यह उदाहरण दिखाता है कि किसी आंदोलन को अपनी एक प्रमुख मांग पर सफलता मिल सकती है, जबकि बाकी मांगें अधूरी रह सकती हैं।
पांच बड़े आंदोलन, जो अपनी प्रमुख मांगें पूरी नहीं करा सके
1. गोरक्षा आंदोलन, 1966
गाय वध पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर 7 नवंबर 1966 को बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़े। प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिस की गोलीबारी में लोगों की मौत हुई। तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा ने इस्तीफा दे दिया।
नतीजा: सरकार ने देशव्यापी प्रतिबंध लागू नहीं किया। इस आंदोलन ने राजनीतिक बहस और गोरक्षा के मुद्दे को प्रभावित किया, लेकिन इसकी मुख्य मांग पूरी नहीं हुई।
2. अखिल भारतीय रेलवे हड़ताल, 1974
रेलवे कर्मचारियों ने वेतन, काम के घंटे और कामकाजी परिस्थितियों में सुधार की मांग को लेकर हड़ताल की। जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई इस हड़ताल में लगभग 17 लाख कर्मचारी शामिल हुए और रेल सेवाएं व्यापक रूप से प्रभावित हुईं।
सरकार ने सख्त कार्रवाई की। कई नेताओं और कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया तथा कर्मचारियों के परिवारों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
नतीजा: हड़ताल मांगों को पूरा कराए बिना समाप्त हो गई। इसने दिखाया कि बड़े पैमाने पर कामकाज ठप कर देना भी हमेशा सरकार से मांगें मनवाने के लिए पर्याप्त नहीं होता।
3. मंडल आयोग के फैसले के खिलाफ आंदोलन, 1990
वी.पी. सिंह सरकार ने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का फैसला किया। इसके विरोध में उत्तर भारत के कई हिस्सों में छात्र प्रदर्शन, हड़ताल और सड़क जाम हुए।
सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया।
नतीजा: आंदोलन अपनी मुख्य मांग पूरी नहीं करा सका। इसके बावजूद आरक्षण और सामाजिक न्याय का मुद्दा भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया। यह उदाहरण बताता है कि सड़कों पर विरोध की तीव्रता हमेशा किसी मुद्दे पर समाज के बहुमत की राय को नहीं दर्शाती।
4. नर्मदा बचाओ आंदोलन, 1980 और 1990 के दशक
मेधा पाटकर और प्रभावित समुदायों के नेतृत्व में चले इस आंदोलन ने बड़े बांधों से विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के सवाल उठाए। आंदोलनकारियों ने पदयात्राएं कीं, भूख हड़ताल की और अदालतों का दरवाजा खटखटाया।
इस अभियान के कारण सरदार सरोवर परियोजना पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समीक्षा हुई। लेकिन बांध का निर्माण नहीं रुका और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास संबंधी शर्तों के साथ इसकी ऊंचाई बढ़ाने की अनुमति दी।
नतीजा: आंदोलन परियोजना को रोकने के अपने प्रमुख लक्ष्य में सफल नहीं हुआ, लेकिन विस्थापन, पर्यावरण और विकास की कीमत पर राष्ट्रीय चर्चा को व्यापक बनाया।
5. CAA विरोध और शाहीन बाग आंदोलन, 2019-20
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और NRC/NPR से जुड़ी चिंताओं के बीच दिसंबर 2019 में देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। दिल्ली के शाहीन बाग में महिलाओं के नेतृत्व में धरना 101 दिनों तक चला। इसने देशभर में कई अन्य प्रदर्शनों को प्रेरित किया।
सरकार ने CAA को वापस नहीं लिया। मार्च 2020 में कोविड-19 से जुड़ी पाबंदियों के बीच धरना समाप्त हो गया। बाद में मार्च 2024 में CAA के नियम अधिसूचित किए गए।
नतीजा: कानून वापस लेने की मांग पूरी नहीं हुई, लेकिन नागरिकता, धर्म और संवैधानिक अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस तेज हुई।
आखिर जनआंदोलन सफल या असफल क्यों होते हैं?
इन उदाहरणों से कुछ व्यापक रुझान सामने आते हैं:
- मांग कितनी स्पष्ट है: किसी एक स्पष्ट मांग पर सरकार के लिए फैसला बदलना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। कई मुद्दों को एक साथ जोड़ने पर सहमति बनाना कठिन हो सकता है।
- जनसमर्थन और उसकी निरंतरता: बड़े प्रदर्शन ध्यान खींच सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक संगठन, भागीदारी और बातचीत बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होता है।
- राजनीतिक दबाव: आंदोलन का असर इस बात पर निर्भर कर सकता है कि उसकी मांगें सरकार के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समीकरणों को कितना प्रभावित करती हैं।
- सरकार की प्रतिक्रिया: बातचीत, कानूनी बदलाव, प्रशासनिक कार्रवाई या सख्ती—हर प्रतिक्रिया आंदोलन के परिणाम को अलग दिशा दे सकती है।
- आंदोलन का दीर्घकालीन प्रभाव: किसी आंदोलन की सफलता केवल तत्काल मांगों से नहीं मापी जा सकती। कभी-कभी वह नए राजनीतिक संगठनों, कानूनों या सामाजिक चेतना को जन्म देता है।
ये कारक हर आंदोलन पर समान रूप से लागू नहीं होते। किसी आंदोलन के नतीजे का आकलन करते समय उसकी घोषित मांगों, हासिल हुए बदलावों और लंबे समय के प्रभाव को अलग-अलग देखना जरूरी है।
CJP के लिए इन आंदोलनों से क्या सीख मिलती है?
CJP के मौजूदा विरोध का घोषित लक्ष्य मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR से जुड़े सवालों पर कार्रवाई की मांग है। आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर कितना समर्थन मिलता है और सरकार तथा चुनाव आयोग उस पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं, यह आगे की दिशा तय करने वाले कारक होंगे।
इतिहास के उदाहरण बताते हैं कि बड़े प्रदर्शन अपने आप में किसी मांग की स्वीकृति की गारंटी नहीं होते। कभी आंदोलन नीति बदलवा देते हैं, कभी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करते हैं और कभी अपनी मुख्य मांग पूरी नहीं करा पाते। CJP के वर्तमान आंदोलन का अंतिम आकलन भी उसके वास्तविक परिणामों, संस्थागत प्रक्रियाओं और उठाए गए सवालों पर हुई कार्रवाई के आधार पर ही किया जा सकेगा।
निष्कर्ष: भारत के जनआंदोलनों का इतिहास किसी एक सरल सूत्र से नहीं समझा जा सकता। हिंदी-विरोधी आंदोलन, जेपी आंदोलन, निर्भया आंदोलन और किसान आंदोलन ने अलग-अलग रूपों में प्रभाव डाला; वहीं रेलवे हड़ताल, नर्मदा बचाओ आंदोलन और CAA विरोध जैसे अभियानों की प्रमुख मांगें पूरी नहीं हुईं। फिर भी, इन आंदोलनों ने सार्वजनिक बहस, राजनीतिक गठबंधनों और नीतिगत फैसलों पर अपनी छाप छोड़ी।





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