News Desk: 2024 के लोकसभा चुनाव में 52 से बढ़कर 99 सीटों तक पहुंची कांग्रेस को लगा था कि उसकी राजनीतिक वापसी की जमीन तैयार हो चुकी है। लेकिन इसके बाद के विधानसभा चुनावों ने कहानी को इतना सीधा नहीं रहने दिया। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ BJP से मुकाबला करना नहीं, बल्कि अपने ही राज्यों में नेतृत्व, संगठन और रणनीति को लेकर पैदा हो रही खींचतान को संभालना है।
इस तस्वीर को समझने के लिए पंजाब और कर्नाटक दो बेहद अहम उदाहरण हैं।
Punjab: जीत का मौका, लेकिन घर में ही घमासान
2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा मौका हो सकते हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने राज्य की 13 में से 7 सीटें जीती थीं और AAP सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गई थी। हालांकि कांग्रेस का वोट शेयर 2019 के 40.12% से घटकर 26.3% हो गया था—यानी सीटों की सफलता को सीधे मजबूत जनाधार मान लेना जोखिम भरा होगा।
अब समस्या संगठन के भीतर है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी के खेमों के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान लगातार खबरों में है। चन्नी समर्थकों की ओर से पार्टी कार्यक्रमों में नारेबाजी और विरोध के बाद हाईकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा है। पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से एकता का संदेश दे रहा है, लेकिन अंदरूनी मतभेद खत्म होने के संकेत अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।
दिलचस्प बात यह है कि BJP ने पंजाब में अपने संगठन का विस्तार करते हुए हाल ही में 12 उपाध्यक्षों में से 6 ऐसे नेताओं को शामिल किया जो Congress, SAD या AAP से आए हैं। यानी कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी का फायदा उसके प्रतिद्वंद्वी उठा रहे हैं।
Karnataka: सत्ता हाथ में, फिर भी संकट
कर्नाटक कांग्रेस के लिए इससे भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां पार्टी सत्ता में है।
2023 में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 224 में से 135 विधानसभा सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर 42.88% रहा था। यह पार्टी का 1999 के बाद सबसे मजबूत विधानसभा प्रदर्शन था।
लेकिन सत्ता में आने के बाद नेतृत्व को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच लंबे समय तक चली खींचतान ने पार्टी को लगातार दबाव में रखा। जून 2026 में डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद नेतृत्व विवाद का एक अध्याय बंद हुआ, लेकिन कैबिनेट गठन और विभागों के बंटवारे को लेकर नई नाराजगियां सामने आ गईं। वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी ने मंत्रालय से इस्तीफे की घोषणा तक कर दी थी, हालांकि बाद में संकट को संभालने की कोशिश हुई।
और आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस को यहां भी आत्मसंतोष की गुंजाइश नहीं है। 2024 लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में कांग्रेस 28 में से 9 सीटें जीत सकी, जबकि BJP ने 17 सीटें जीतीं। विधानसभा में भारी जीत के एक साल बाद आया यह परिणाम बताता है कि विधानसभा और लोकसभा का वोटर एक जैसा व्यवहार जरूरी नहीं करता।
राष्ट्रीय तस्वीर भी चेतावनी दे रही है
2024 में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन उसके बाद बिहार में 2025 विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ 6 सीटों पर सिमट गई, जबकि NDA ने 202 में से 243 सीटें जीत लीं।
2026 में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें मिलीं और असम में 19 सीटें, जबकि BJP ने क्रमशः 207 और 82 सीटें जीतीं। दूसरी ओर केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का मजबूत प्रदर्शन यह भी दिखाता है कि पार्टी पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है—समस्या राज्यों में उसके संगठन और नेतृत्व की असमान स्थिति है।
असल संकट क्या है?
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद “कौन जीतेगा?” नहीं, बल्कि “कौन नेतृत्व करेगा और किस रणनीति के साथ?” है।
पंजाब में नेतृत्व का संघर्ष, कर्नाटक में सत्ता के भीतर खींचतान और उत्तर प्रदेश में सहयोगी दलों के साथ सीट-बंटवारे को लेकर असमंजस—ये सभी एक ही समस्या की ओर इशारा करते हैं: राष्ट्रीय नेतृत्व और राज्य संगठन के बीच तालमेल।
क्योंकि मतदाता की नाराजगी अपने आप कांग्रेस के वोट में नहीं बदलती। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, ग्रामीण संकट और महंगाई जैसे मुद्दे तभी चुनावी लाभ देते हैं, जब कोई पार्टी उन्हें स्थानीय नेतृत्व, संगठन और बूथ स्तर की मशीनरी के जरिए वोट में बदल पाए।
यही कांग्रेस की असली परीक्षा है।
2029 की लड़ाई दिल्ली में नहीं, राज्यों में आज से तैयार हो रही है। और अगर कांग्रेस ने अपनी अंदरूनी लड़ाइयां नहीं सुलझाईं, तो उसके विरोधियों को उसे हराने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।




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