News Desk: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले BJP के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर विपक्ष से मुकाबला करने की तैयारी है, तो दूसरी ओर पार्टी के भीतर टिकट और संगठन में पदों को लेकर असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप का पार्टी छोड़ने का ऐलान, विधान परिषद चुनाव में डॉ. संजयन त्रिपाठी का समाजवादी पार्टी के टिकट पर उतरना और कुछ वरिष्ठ नेताओं के बयानों ने अंदरूनी खींचतान को चर्चा में ला दिया है।
सवाल यह है कि क्या यह असंतोष कुछ नेताओं तक सीमित रहेगा या 2027 के विधानसभा चुनाव में BJP के लिए व्यापक चुनौती बन सकता है?
1. धर्मेंद्र कश्यप की नाराजगी: टिकट से आगे संगठन में सम्मान का सवाल
आंवला से पूर्व BJP सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने अक्टूबर 2026 में पार्टी छोड़ने का ऐलान किया। वह 2014 और 2019 में BJP के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन 2024 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
5 अक्टूबर को BJP की राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद कश्यप ने सोशल मीडिया पर नाराजगी जाहिर की। अगले दिन उन्होंने पार्टी छोड़ने की घोषणा की। उनकी शिकायत केवल राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने आरोप लगाया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उनके खिलाफ काम करने वाले लोगों पर कार्रवाई नहीं हुई और ऐसे लोग पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए हैं।
कश्यप ने अपने अगले राजनीतिक कदम का तत्काल ऐलान नहीं किया। हालांकि, बरेली में एक कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी के बाद समाजवादी पार्टी में जाने की अटकलें तेज हुईं। इसे किसी औपचारिक राजनीतिक फैसले का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
उनका मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह टिकट वितरण के साथ-साथ संगठन में सम्मान, जवाबदेही और पुराने नेताओं की भूमिका पर भी सवाल उठाता है।
2. संजयन त्रिपाठी का सपा के टिकट पर उतरना BJP के लिए क्यों अहम?
BJP के भीतर असंतोष का दूसरा उदाहरण विधान परिषद के गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से सामने आया। डॉ. संजयन त्रिपाठी मौजूदा MLC ध्रुव कुमार त्रिपाठी को BJP का समर्थन मिलने से नाराज थे।
पहले उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन किया और बाद में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बन गए। तीन अक्टूबर को लखनऊ में अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनकी मौजूदगी ने इस राजनीतिक बदलाव को स्पष्ट कर दिया।
संजयन त्रिपाठी ने कहा कि जिस पार्टी में उन्होंने वर्षों तक काम किया, वहां उनका तिरस्कार हुआ, जबकि समाजवादी पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया।
BJP की ओर से क्षेत्रीय अध्यक्ष विनोद राय ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि टिकट के कई दावेदार हो सकते हैं, लेकिन उम्मीदवार एक ही बनता है। उनके मुताबिक, पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन करना चाहिए था।
यह विवाद बताता है कि टिकट न मिलने पर असंतुष्ट नेता विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बन सकते हैं। लेकिन किसी नेता का दल बदलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसके समर्थक भी उसी दिशा में जाएंगे।
3. कौशल किशोर के परिवार की नाराजगी, बृजभूषण और संजीव बालियान के बयान
BJP में असंतोष की चर्चा केवल धर्मेंद्र कश्यप और संजयन त्रिपाठी तक सीमित नहीं है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और मोहनलालगंज के पूर्व सांसद कौशल किशोर के परिवार की नाराजगी भी सामने आई। राज्यसभा में जगह नहीं मिलने के बाद उनके बेटे विकास किशोर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि जहां माता-पिता का सम्मान न हो, वहां नहीं रहना चाहिए। हालांकि, इस टिप्पणी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कौशल किशोर या उनका परिवार पार्टी छोड़ने जा रहा है।
इसी तरह कैसरगंज के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के कुछ सार्वजनिक बयान BJP के लिए असहजता का कारण बने हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान भी अधिकारियों के व्यवहार और प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने BJP और समाजवादी पार्टी के बीच कड़े मुकाबले की संभावना भी जताई है।
इन घटनाओं को एक ही तरह की बगावत कहना उचित नहीं होगा। अलग-अलग नेताओं की नाराजगी के कारण, राजनीतिक महत्व और पार्टी छोड़ने की संभावना अलग-अलग हैं। फिर भी, जब असंतोष सार्वजनिक मंच पर आने लगता है, तो पार्टी नेतृत्व के सामने उसे संभालने की चुनौती बढ़ जाती है।
4. 2022 की बगावत से BJP क्या सीख सकती है?
2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी BJP को इसी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। तत्कालीन मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने 11 जनवरी 2022 को मंत्रिमंडल और पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। इसके अगले दिन दारा सिंह चौहान ने भी मंत्री पद छोड़ा। इसके बाद धर्म सिंह सैनी समेत कई नेताओं ने BJP से दूरी बनाकर समाजवादी पार्टी का रुख किया।
इन नेताओं ने पिछड़े वर्गों और वंचित समुदायों की उपेक्षा का आरोप लगाया था। समाजवादी पार्टी ने इस घटनाक्रम को सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़ते हुए BJP से आए नेताओं के जरिए गैर-यादव OBC मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की।
लेकिन उस चुनाव का परिणाम यह भी दिखाता है कि बगावत और चुनावी हार के बीच सीधा संबंध मानना सही नहीं है। BJP ने 2022 में उत्तर प्रदेश में सत्ता बरकरार रखी।
इसलिए 2027 के लिए भी केवल यह गिनना पर्याप्त नहीं होगा कि कितने नेता नाराज हैं या कितने पार्टी छोड़ रहे हैं। ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि इन नेताओं की अपने क्षेत्रों में कितनी पकड़ है, उनके साथ कितना संगठनात्मक समर्थन है और क्या उनकी नाराजगी किसी बड़े सामाजिक या राजनीतिक मुद्दे से जुड़ती है।
5. BJP के लिए असली खतरा क्या है?
BJP की एक बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर तक फैला संगठन और विभिन्न सामाजिक समूहों को साथ लाने की रणनीति रही है। ऐसे में पार्टी के सामने चुनौती केवल नाराज नेताओं को मनाने की नहीं, बल्कि उनके समर्थकों को संगठन से जोड़े रखने की भी है।
अगर असंतोष कुछ नेताओं और कुछ क्षेत्रों तक सीमित रहता है, तो उसका असर सीमित हो सकता है। लेकिन यदि विपक्ष इन घटनाओं को टिकट वितरण में असमानता, सामाजिक प्रतिनिधित्व या नेताओं के सम्मान के मुद्दे से जोड़कर व्यापक राजनीतिक विमर्श बनाने में सफल होता है, तो BJP के लिए चुनौती बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व के पास उम्मीदवार बदलने, संगठन में जिम्मेदारियां बांटने और स्थानीय समीकरणों के मुताबिक रणनीति बनाने जैसे विकल्प भी हैं। इसलिए अभी से यह मान लेना कि मौजूदा नाराजगी 2027 के चुनाव का परिणाम तय कर देगी, सही नहीं होगा।
निष्कर्ष: 2027 में टिकट से लेकर सामाजिक समीकरण तक होगी परीक्षा
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव BJP के लिए केवल सरकार के कामकाज और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की परीक्षा नहीं होगा। उम्मीदवारों की स्वीकार्यता, संगठन के भीतर तालमेल और अलग-अलग सामाजिक समूहों के साथ पार्टी के रिश्ते भी महत्वपूर्ण होंगे।
धर्मेंद्र कश्यप की नाराजगी, संजयन त्रिपाठी का सपा के टिकट पर उतरना और दूसरे नेताओं के सार्वजनिक बयान BJP के सामने एक चेतावनी जरूर हैं। लेकिन यह असंतोष चुनावी चुनौती में कितना बदलेगा, इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या BJP अपने भीतर उठती नाराजगी को समय रहते संभाल पाएगी, या विपक्ष इन दरारों को 2027 के चुनाव में राजनीतिक मुद्दा बनाने में सफल होगा?





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