News Desk: दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति या संगठन प्रदर्शन के नाम पर किसी जगह पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकता। प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों पर भी एक निश्चित समय-सीमा होनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी जंतर-मंतर पर पिछले महीने हुए बड़े प्रदर्शन और रामलीला मैदान में विपक्षी दलों की रैली से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि सभी को विरोध करने का अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर दूसरे लोगों के अधिकारों और जरूरतों का भी ध्यान रखना होगा।
‘दूसरे प्रदर्शनकारी भी हैं, किसान और वकील कहां जाएंगे?’
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि किसी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं किया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर एक समूह किसी स्थान पर अनिश्चितकाल तक बैठा रहेगा, तो दूसरे प्रदर्शनकारी वहां कैसे पहुंचेंगे।
सीजेआई ने कहा, “आप किसी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते। दूसरे प्रदर्शनकारी भी हैं। किसान कहां जाएंगे, वकील कहां जाएंगे? हर किसी को विरोध करने का अधिकार है।”
अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह था कि प्रदर्शन का अधिकार बना रहे, लेकिन किसी सार्वजनिक स्थल का इस्तेमाल स्थायी कब्जे की तरह नहीं किया जा सकता।
जंतर-मंतर का दर्जा हटाने के बाद बढ़ा विवाद
दिल्ली के जंतर-मंतर को लंबे समय से विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। पिछले महीने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों और अन्य संगठनों के प्रदर्शन के बाद इस स्थान को लेकर विवाद बढ़ा।
दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर का निर्धारित प्रदर्शन स्थल का दर्जा हटाते हुए तीन वैकल्पिक स्थान घोषित किए थे—रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और CBD ग्राउंड।
यह कदम सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी के बाद उठाया गया था, जिसमें शांतिपूर्ण और वैध प्रदर्शन के लिए उपयुक्त वैकल्पिक स्थलों तथा बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था पर विचार करने को कहा गया था।
केंद्र ने कहा- प्रदर्शन की जिम्मेदारी आयोजकों की भी
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जो भी संगठन या व्यक्ति प्रदर्शन का आह्वान करता है, उसे उससे पैदा होने वाले परिणामों की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए।
मेहता ने अदालत को बताया कि 20 जुलाई के प्रदर्शन की अनुमति केवल एक दिन के लिए दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने स्थान खाली नहीं किया और संसद की ओर मार्च भी किया।
उन्होंने कहा कि संसद और सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करना सामान्य राजनीतिक गतिविधि की तरह नहीं देखा जा सकता। इस दौरान अदालत के सामने प्रदर्शन की अनुमति, निर्धारित सीमाओं और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दे उठे।
व्यापारियों ने प्रदर्शन से कारोबार प्रभावित होने की शिकायत की
सुप्रीम कोर्ट के सामने व्यापारिक संगठनों की याचिका भी थी। व्यापारियों ने त्योहारों के मौसम में दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों पर रोक लगाने की मांग की थी। उनका कहना था कि लगातार प्रदर्शन, रास्तों की बंदी और सुरक्षा व्यवस्था के कारण कारोबार प्रभावित हो रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने व्यापारिक संगठनों की ओर से दलील दी कि प्रदर्शन स्थल के आसपास रहने वाले करीब 50 लाख लोगों और कारोबारियों को परेशानी हुई। उन्होंने दावा किया कि कई दुकानें बंद रहीं और कनॉट प्लेस में भी लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई।
अदालत ने कहा कि व्यापारियों की नुकसान संबंधी याचिका पर विचार करने के लिए प्रदर्शन आयोजित करने वाले संगठनों को भी मामले में पक्षकार बनाना जरूरी है। पीठ ने व्यापारिक संगठनों से कहा कि वे संबंधित प्रदर्शनकारी संगठनों को याचिका में शामिल करें।
किन मामलों की सुनवाई कर रही है अदालत?
सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में हालिया प्रदर्शनों से जुड़े कई मामलों पर सुनवाई कर रहा है। इनमें कथित पुलिस कार्रवाई, हिरासत, सार्वजनिक आवाजाही पर प्रतिबंध, मेट्रो सेवाओं और इंटरनेट पर असर तथा जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित किए जाने से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
अदालत ने पहले भी कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को कानून के अनुसार अधिकार मिलना चाहिए और दिल्ली में लोगों की आवाजाही तथा मेट्रो-रेल सेवाएं सामान्य रूप से संचालित होनी चाहिए, बशर्ते कानून-व्यवस्था की स्थिति के तहत कोई वैध प्रतिबंध जरूरी न हो।
प्रदर्शन का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था- दोनों अहम
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी में दो पहलू सामने आए हैं। एक ओर नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल इस तरह नहीं हो सकता कि अन्य लोगों की आवाजाही, कारोबार या दूसरे समूहों के प्रदर्शन का अधिकार प्रभावित हो।
अदालत ने फिलहाल यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान की है। यह किसी व्यापक मामले में अंतिम फैसला नहीं है। व्यापारियों की याचिका और दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े अन्य मुद्दों पर आगे की सुनवाई में अदालत का रुख स्पष्ट होगा।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के अधिकार को बरकरार रखते हुए सार्वजनिक स्थलों पर अनिश्चितकालीन कब्जे के खिलाफ स्पष्ट संदेश दिया है। अदालत के मुताबिक, निर्धारित प्रदर्शन स्थलों पर भी समय-सीमा होनी चाहिए, ताकि विरोध का अधिकार और आम नागरिकों के हित—दोनों के बीच संतुलन बना रहे।





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