News Desk: एक चुनाव आयोग, तीन कमिश्नर और अब उठ रहे गंभीर सवाल—क्या SIR सिर्फ वोटर लिस्ट की कवायद है या इसके पीछे चुनावी प्रक्रिया को लेकर बड़ा संस्थागत विवाद खड़ा हो गया है?
Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar को लेकर विपक्ष का विरोध अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। विवाद के केंद्र में है Special Intensive Revision यानी SIR, वोटर लिस्ट में बदलाव, Election Commission के भीतर कथित मतभेद और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया।
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने पिछले करीब 10 महीनों में कई फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार ऐसी कम से कम 14 objections सामने आईं। इनमें SIR, Form 6, वोटर नाम जोड़ने-हटाने, पुराने नाम बहाल करने और electoral-roll data तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
वहीं Election Commission ने इन रिपोर्टों के आधार पर किसी institutional breakdown की बात से इनकार किया है। आयोग के मुताबिक महत्वपूर्ण फैसले तीनों Election Commissioners की मंजूरी से लिए गए और अलग-अलग विचार या टिप्पणियां संस्थागत deliberation का हिस्सा हो सकती हैं।
यही विरोधाभासी दावे इस पूरे विवाद को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
आखिर विवाद शुरू कहां से हुआ?
पूरे मामले को समझने के लिए पहले SIR को समझना जरूरी है।
Special Intensive Revision का उद्देश्य electoral roll की व्यापक समीक्षा करना है। बिहार में इसकी शुरुआत 24 जून 2025 को हुई थी। Election Commission ने इसके लिए Article 324 और Representation of the People Act, 1950 की Section 21(3) का आधार लिया था। आयोग ने कहा था कि बिहार में आखिरी intensive revision 2003 में हुई थी और उसके बाद urbanisation, migration, deaths और duplicate entries जैसे कारणों से electoral rolls की accuracy की समीक्षा जरूरी थी।
आंकड़ा जो विवाद की गंभीरता बताता है
बिहार SIR के दौरान draft electoral roll में करीब 65 लाख electors शामिल नहीं थे।
यह आंकड़ा इसलिए बड़ा था क्योंकि उस समय बिहार की electoral roll में करीब 7.89 करोड़ electors थे।
बाद की प्रक्रिया के बाद final electoral roll में लगभग 7.42 करोड़ electors रहे।
यानी सवाल सिर्फ राजनीतिक दलों का नहीं था—यह सीधे करोड़ों मतदाताओं के electoral status से जुड़ा exercise था।
SIR पर Supreme Court ने क्या कहा?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है।
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 27 मई 2026 को Supreme Court ने बिहार SIR को वैध ठहराया।
Court ने माना कि Election Commission के पास Article 324 और Section 21(3) RP Act के तहत special revision करने की शक्ति है और बिहार में exercise का उद्देश्य electoral roll की accuracy और integrity सुनिश्चित करना था।
लेकिन Supreme Court की proceedings के दौरान कुछ महत्वपूर्ण safeguards भी सामने आए।
मसलन, Court ने excluded electors की सूची reasons के साथ प्रकाशित करने को कहा और Aadhaar को identity establish करने के लिए एक अतिरिक्त document के रूप में स्वीकार करने का निर्देश दिया- साथ ही यह स्पष्ट किया कि Aadhaar citizenship का proof नहीं है।
इसलिए SIR को लेकर मौजूदा राजनीतिक बहस को यह समझकर देखना जरूरी है कि Supreme Court ने बिहार के SIR की वैधता को बरकरार रखा था, जबकि प्रक्रिया में safeguards भी निर्धारित किए गए थे।
फिर Gyanesh Kumar पर नया विवाद क्यों?
सितंबर 2026 में विवाद का नया चरण तब सामने आया जब एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने Commission के कुछ फैसलों पर बार-बार objections दर्ज किए थे।
रिपोर्ट के अनुसार करीब 10 महीनों में 14 objections दर्ज किए गए।
इन objections में कथित तौर पर ये मुद्दे शामिल थे:
- SIR से जुड़े फैसले
- नए voters के registration
- electoral roll से नाम हटाना
- हटाए गए नामों को restore करना
- Form 6 में बदलाव
- electoral-roll database की security
- voter data तक पहुंच और IT systems का संचालन
अगर इन रिपोर्टों में बताए गए objections को सही संदर्भ में देखा जाए तो विवाद सिर्फ किसी एक राज्य की voter list तक सीमित नहीं है।
यह सवाल Election Commission की internal decision-making process तक पहुंचता है।
Form 6 इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
Form 6 वह application है जिसके जरिए eligible व्यक्ति voter list में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करता है।
इसलिए Form 6 में बदलाव का सीधा संबंध नए मतदाताओं के registration से है।
हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि इस form में ऐसे सवाल/requirements जोड़े गए जिनमें applicant से उसके या उसके माता-पिता/दादा-दादी के पुराने electoral roll में नाम होने से जुड़ी जानकारी मांगी गई।
यही वजह है कि Form 6 इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण technical issue बन गया है।
विपक्ष क्यों मांग रहा है Gyanesh Kumar का इस्तीफा?
विपक्षी दलों का आरोप है कि Election Commission की कार्यप्रणाली में transparency और institutional independence से जुड़े सवाल खड़े हुए हैं।
हालिया रिपोर्ट के बाद कई विपक्षी नेताओं ने Gyanesh Kumar के resignation या removal की मांग की है। कुछ नेताओं ने तो हाल के चुनावों की समीक्षा और दूसरे कदमों की भी मांग की है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण distinction है:
ये विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोप और राजनीतिक मांगें हैं।
Election Commission ने internal breakdown की धारणा को खारिज किया है और कहा है कि निर्णय तीनों Commissioners की approval से लिए गए।
इसलिए अभी उपलब्ध public record में दो अलग narratives मौजूद हैं—
विपक्ष का आरोप: institutional functioning और electoral process को लेकर गंभीर सवाल।
EC का पक्ष: decisions collectively approved हुए और objections को institutional deliberation के सामान्य हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
193 सांसदों वाला मामला क्या था?
Gyanesh Kumar को लेकर विवाद नया नहीं है।
मार्च 2026 में विपक्ष के 193 सांसदों- 130 Lok Sabha और 63 Rajya Sabha MPs ने CEC को हटाने की मांग वाले notice पर हस्ताक्षर किए थे।
यह पहली बार था जब किसी sitting Chief Election Commissioner को हटाने की मांग वाला ऐसा notice संसद में लाया गया था।
विपक्षी notice में सात आरोप बताए गए थे, जिनमें alleged partisan conduct, electoral fraud की जांच में obstruction और mass disenfranchisement जैसे आरोप शामिल थे। ये आरोप उस समय विपक्ष की ओर से लगाए गए थे, न कि न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य।
लेकिन इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए केवल राजनीतिक आरोप पर्याप्त नहीं होते।
CEC को हटाना इतना आसान क्यों नहीं?
भारत के संविधान में Election Commission की independence को विशेष सुरक्षा दी गई है।
Article 324(5) के तहत Chief Election Commissioner को उसी तरह और उन्हीं grounds पर हटाया जा सकता है जिस तरह Supreme Court के Judge को हटाया जाता है।
CEC के मामले में broadly removal के लिए proven misbehaviour या incapacity जैसे संवैधानिक grounds जरूरी होते हैं।
और Parliament में motion पास करने के लिए भी सामान्य majority पर्याप्त नहीं है।
इसके लिए दोनों सदनों में special majority की संवैधानिक प्रक्रिया लागू होती है।
यानी 193 MPs का notice अपने आप में removal नहीं है।
यह सिर्फ removal process शुरू करने की दिशा में एक parliamentary step हो सकता है।
लेकिन 193 सांसदों का notice हुआ क्या?
यह भी इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मार्च में 193 Opposition MPs द्वारा signed notice के बाद Lok Sabha Speaker और Rajya Sabha Secretariat ने अप्रैल 2026 में notices को admit नहीं किया।
यानी वह removal attempt उस stage पर आगे नहीं बढ़ पाया।
इसलिए आज जब फिर से Gyanesh Kumar के resignation/removal की मांग उठ रही है, तो इसे मार्च-अप्रैल के घटनाक्रम से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
विवाद का सबसे बड़ा सवाल: Election Commission के भीतर असहमति कितनी महत्वपूर्ण है?
यही इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील institutional question है।
Election Commission एक तीन सदस्यीय constitutional body है, Chief Election Commissioner और दो Election Commissioners।
अगर दो Commissioners किसी महत्वपूर्ण administrative या electoral decision पर objection दर्ज करते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि:
क्या यह केवल internal deliberation है या decision-making process में गंभीर institutional disagreement?
इसका जवाब अभी public claims के स्तर पर contested है।
Election Commission का कहना है कि decisions collective approval से लिए गए।
दूसरी तरफ रिपोर्टों में दर्ज objections को विपक्ष institutional concern के प्रमाण के रूप में देख रहा है।
इसलिए इस controversy को समझने का सबसे अहम तरीका है- आरोप, reported objections और officially stated EC position को अलग-अलग रखना।
SIR की बहस अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं
Election Commission की current voter-services platform पर SIR 2026 से जुड़े services भी उपलब्ध हैं, जिसमें enumeration form, previous SIR में नाम search करने और notice के जवाब में documents submit करने जैसी सुविधाएं दिखाई गई हैं।
इसका मतलब है कि SIR अब सिर्फ 2025 के बिहार exercise की कहानी नहीं रह गया है।
यह electoral-roll management को लेकर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है।
अब आगे क्या?
मौजूदा विवाद में कम से कम चार बड़े सवाल सामने हैं:
1. क्या EC के भीतर दर्ज objections का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक होगा?
यह सवाल transparency से जुड़ा है।
2. SIR के दौरान voter inclusion और exclusion का independent assessment होगा?
क्योंकि electoral roll में नाम होना सीधे voting rights के exercise से जुड़ा है।
3. क्या Parliament में CEC removal की प्रक्रिया दोबारा उठेगी?
मार्च 2026 में 193 MPs का notice admit नहीं हुआ था। इसलिए आगे की कोई भी parliamentary move अपनी अलग procedural स्थिति के साथ आएगी।
4. क्या विवाद राजनीतिक रहेगा या institutional accountability तक जाएगा?
यही आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल हो सकता है।
निष्कर्ष: असली मुद्दा सिर्फ Gyanesh Kumar नहीं, Electoral Trust है
CEC Gyanesh Kumar को लेकर चल रहा विवाद केवल एक व्यक्ति के resignation या removal की मांग तक सीमित नहीं है।
इसके केंद्र में तीन बड़े मुद्दे हैं-
Voter List की Accuracy
Election Commission की Institutional Functioning
और Electoral Process पर Public Trust
SIR को Supreme Court ने बिहार के मामले में संवैधानिक और वैधानिक framework के भीतर वैध माना है। लेकिन मौजूदा controversy ने Election Commission की internal decision-making, transparency और voter-roll management पर नई राजनीतिक बहस जरूर खड़ी कर दी है।
आखिर लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ मतदान के दिन नहीं होता।
चुनाव की विश्वसनीयता उस voter list से शुरू होती है, जिस पर मतदान का पूरा सिस्टम खड़ा होता है।
और यही वजह है कि Gyanesh Kumar को लेकर उठा मौजूदा विवाद आने वाले समय में सिर्फ एक राजनीतिक confrontation नहीं, बल्कि भारत की electoral institutions और public trust की बड़ी बहस बन सकता है।





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