News Desk: दुनिया की राजनीति में इन दिनों एक शब्द बार-बार सुनाई दे रहा है, Global South यानी वैश्विक दक्षिण। खासकर दिल्ली में हुए 2026 BRICS Summit के दौरान भारत ने इसे अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं के केंद्र में रखा। लेकिन आखिर Global South है क्या? इसमें कौन-कौन से देश आते हैं और इसकी मांगें इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई हैं?
Global South का मतलब क्या है?
सबसे पहले एक गलतफहमी दूर करना जरूरी है। Global South का मतलब दुनिया के दक्षिणी गोलार्ध में स्थित देश नहीं है। यह मुख्य रूप से उन विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है, जिनका इतिहास औपनिवेशिक शासन, आर्थिक असमानता और वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व से जुड़ा रहा है। UNCTAD की व्यापक वर्गीकरण पद्धति में इसमें अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन, एशिया के बड़े हिस्से और ओशिनिया के कई विकासशील देश शामिल होते हैं।
यानी भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, कई अफ्रीकी देश और लैटिन अमेरिकी राष्ट्र इस व्यापक समूह का हिस्सा माने जा सकते हैं। हालांकि Global South कोई औपचारिक संगठन या निश्चित सदस्यता वाला क्लब नहीं है।
इसकी सबसे बड़ी मांग क्या है?
Global South की मूल मांग है. वैश्विक फैसलों में ज्यादा हिस्सेदारी और ज्यादा न्यायपूर्ण व्यवस्था।
आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, IMF, World Bank और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में निर्णय लेने की व्यवस्था काफी हद तक पुराने शक्ति-संतुलन पर आधारित है। Global South का तर्क है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था, आबादी और राजनीतिक शक्ति बदल चुकी है, इसलिए वैश्विक संस्थाओं में भी उसी अनुपात में बदलाव होना चाहिए।
2026 BRICS Summit में भी UN Security Council में विकासशील देशों की बेहतर प्रतिनिधित्व की मांग दोहराई गई। BRICS घोषणा में कहा गया कि वैश्विक संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और न्यायसंगत बनाया जाना चाहिए।
Climate Change से लेकर कर्ज तक
Global South की चिंताएं सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं हैं। इसके सामने climate finance, बढ़ता कर्ज, food और energy security, technology gap, AI और विकास के लिए सस्ती financing जैसे बड़े मुद्दे हैं।
जलवायु परिवर्तन इसका बड़ा उदाहरण है। कई विकासशील देशों का कहना है कि ऐतिहासिक रूप से उनका उत्सर्जन कम रहा है, लेकिन climate disasters का असर उन्हें disproportionately झेलना पड़ रहा है। इसलिए विकसित देशों से climate finance और technology transfer की मांग लगातार बढ़ रही है।
इसी तरह AI जैसी नई तकनीकों में भी Global South बराबर की भागीदारी चाहता है। UNCTAD के मुताबिक 2026 में 118 देश जिनमें अधिकांश Global South से हैं, प्रमुख AI governance forums से बाहर हैं।
BRICS इतना महत्वपूर्ण क्यों?
यहीं BRICS की भूमिका सामने आती है। 2026 में BRICS में 11 सदस्य हैं—ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और UAE। ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5% आबादी, 40% GDP और 26% वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसलिए BRICS अब केवल पांच देशों का आर्थिक समूह नहीं रहा। यह Global South की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत करने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है।
भारत इसी भूमिका को और व्यापक बनाना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS को सिर्फ सदस्य देशों तक सीमित न रखकर व्यापक Global South के विकास और जरूरतों के लिए काम करने की बात कही है।
क्या Global South एकजुट है?
यह सबसे बड़ा सवाल है। जवाब है - पूरी तरह नहीं।
भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों के अपने क्षेत्रीय मतभेद हैं। आर्थिक हित भी अलग-अलग हैं। इसलिए Global South को एक single political bloc मानना सही नहीं होगा।
फिर भी इन देशों में कुछ साझा मुद्दे हैं, बेहतर प्रतिनिधित्व, विकास के लिए वित्त, climate justice, technology access और एक multipolar world order।
यही वजह है कि आज Global South केवल एक भौगोलिक या आर्थिक शब्द नहीं, बल्कि बदलती हुई वैश्विक शक्ति-संरचना का संकेत बन गया है। असली चुनौती अब यह है कि यह बढ़ती आवाज सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रहेगी या वास्तव में वैश्विक संस्थाओं और फैसलों को बदलने की ताकत भी हासिल करेगी।




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