The Quiver hindi: अगर आज समुद्र का बढ़ता पानी सिर्फ समुद्र किनारे की लहरों तक सीमित दिखाई देता है, तो संयुक्त राष्ट्र की नई चेतावनी बताती है कि आने वाले वर्षों में इसका असर घरों, सड़कों, कारोबार और पूरी-की-पूरी बस्तियों तक पहुंच सकता है। UN की नई रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया के निचले तटीय इलाकों में 1.4 करोड़ से ज्यादा लोग अपने घरों के स्थायी रूप से डूबने के तत्काल जोखिम का सामना कर रहे हैं। इनमें भारत के मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहर शामिल हैं।
समुद्र का स्तर आखिर बढ़ क्यों रहा है?
समुद्र का बढ़ता स्तर जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम है। पृथ्वी का तापमान बढ़ने से समुद्र का पानी गर्म होकर फैलता है, जबकि ग्लेशियर और बर्फ की चादरें पिघलकर समुद्र में अतिरिक्त पानी पहुंचाती हैं।
UN के मुताबिक 2024 में वैश्विक समुद्र स्तर लगभग 5.9 मिलीमीटर बढ़ा, जो रिकॉर्ड स्तर है। यह वृद्धि सिर्फ एक साल का आंकड़ा नहीं है, बल्कि लंबे समय से तेज होती समुद्री वृद्धि का संकेत है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि मौजूदा समुद्र-स्तर वृद्धि मानव इतिहास में अभूतपूर्व गति से हो रही है।
मुंबई और कोलकाता क्यों हैं ज्यादा vulnerable?
मुंबई एक घनी आबादी वाला तटीय महानगर है, जहां शहर का बड़ा हिस्सा समुद्र के बेहद करीब और कुछ स्थानों पर निचले भूभाग पर स्थित है। दूसरी तरफ कोलकाता गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना डेल्टा क्षेत्र के करीब है, जो स्वाभाविक रूप से समुद्र और बाढ़ के प्रति संवेदनशील है।
समस्या सिर्फ समुद्र के ऊपर उठने की नहीं है। Land subsidence यानी जमीन का धीरे-धीरे नीचे धंसना कई तटीय शहरों में जोखिम को और बढ़ा सकता है। इसका मतलब है कि किसी इलाके में समुद्र का स्तर भले कुछ मिलीमीटर बढ़े, लेकिन अगर जमीन भी नीचे जा रही हो तो स्थानीय स्तर पर प्रभाव कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है।
खतरा सिर्फ घर खोने तक सीमित नहीं
समुद्री जलस्तर बढ़ने पर सबसे पहले तटीय बाढ़ और erosion का खतरा बढ़ता है। लेकिन इसके बाद असर पीने के पानी और खेती तक पहुंच सकता है।
Saltwater intrusion यानी खारा समुद्री पानी जमीन के भीतर मौजूद मीठे पानी और कृषि भूमि में प्रवेश कर सकता है। इससे groundwater, खेती और सिंचाई प्रभावित हो सकती है। अस्पताल, स्कूल, सड़कें, sanitation systems और बिजली जैसी critical infrastructure भी ज्यादा vulnerable हो जाती हैं।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “कितने घर डूबेंगे?” बल्कि यह भी है कि अगर किसी शहर के बड़े हिस्से में बार-बार बाढ़ आती है, तो वहां रहना, काम करना और कारोबार चलाना कितना मुश्किल हो जाएगा।
दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा?
UN के अनुसार दुनिया में करीब 770 million लोग ऐसे तटीय इलाकों में रहते हैं जो high-tide line से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं। समुद्र का बढ़ता स्तर इन समुदायों को flooding, erosion और salinisation के बढ़ते खतरे में डाल रहा है।
संयुक्त राष्ट्र ने यह भी चेताया है कि 2050 तक समुद्र-स्तर वृद्धि और उससे जुड़े climate impacts वैश्विक स्तर पर 1.2 billion तक लोगों के displacement में योगदान कर सकते हैं—हालांकि यह एक व्यापक संभावित अनुमान है, न कि निश्चित विस्थापन संख्या।
क्या मुंबई और कोलकाता का भविष्य तय हो चुका है?
नहीं। यही इस चेतावनी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
UN साफ कहता है कि समुद्र का कुछ बढ़ना अब “locked in” है, लेकिन भविष्य में वृद्धि कितनी होगी, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया greenhouse-gas emissions को कितनी तेजी से कम करती है। साथ ही, coastal cities को मजबूत drainage, flood barriers, wetlands और mangrove protection, resilient infrastructure, early-warning systems और बेहतर urban planning पर निवेश करना होगा।
इसलिए मुंबई और कोलकाता के लिए यह किसी दूर के भविष्य की कहानी नहीं है। यह एक चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ तापमान बढ़ने का सवाल नहीं—यह इस बात का सवाल भी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारे शहर कितने रहने लायक बचेंगे।




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