News Desk: पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जिस राज्य में सरकार नशा तस्करी रोकने के लिए अभियान चला रही है, वहीं नशे के कथित अवैध कारोबार का विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता की दिनदहाड़े हत्या ने पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और दवा नियामक व्यवस्था की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मानसा में नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाले परविंदर सिंह झोटा की हत्या के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या नशे के कारोबार पर रोक लगाने की कोशिशों को व्यवस्था के भीतर मौजूद कमियां कमजोर कर रही हैं? NDTV की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मेडिकल स्टोर पर प्रतिबंधित और नशे की लत पैदा करने वाली दवाओं की कथित अवैध बिक्री, बार-बार कार्रवाई के बावजूद कारोबार जारी रहने और पुलिसकर्मियों पर नशा तस्करी में शामिल होने के आरोप इस समस्या की गंभीरता दिखाते हैं।
1. फेसबुक लाइव के दौरान हुई झोटा की हत्या
13 अक्टूबर 2026 को पंजाब के मानसा में परविंदर सिंह झोटा की एक मेडिकल स्टोर संचालक के साथ विवाद के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई। झोटा उस समय फेसबुक लाइव कर रहे थे और कथित तौर पर एक बुजुर्ग व्यक्ति को नशीली दवाएं बेचे जाने के आरोप को लेकर दुकानदार से सवाल कर रहे थे।
वीडियो में बहस बढ़ती दिखाई देती है। इसके बाद दुकानदार ने कथित तौर पर गोली चला दी। झोटा की मौत के बाद मामला केवल हत्या की जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नशे के कथित अवैध कारोबार और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही का मुद्दा भी बन गया।
पुलिस ने मुख्य आरोपी मेडिकल स्टोर संचालक अश्वनी कुमार को राजस्थान से गिरफ्तार किया। उसके खिलाफ हत्या सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। मामले में दर्ज आरोपों और जांच के निष्कर्षों को अलग-अलग समझना जरूरी है; अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी अदालत में तय होगी।
2. आरोपी मेडिकल स्टोर पर पहले भी उठे थे सवाल
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, झोटा की हत्या के आरोपी अश्वनी कुमार के मेडिकल स्टोर पर पिछले चार वर्षों में लगभग 10 बार छापेमारी की गई थी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दुकान के लाइसेंस को कई बार निलंबित किया गया और आरोपी के खिलाफ पांच मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई।
यहां सबसे अहम सवाल है: यदि किसी दुकान के खिलाफ बार-बार शिकायतें और कार्रवाई होती रही, तो कथित अनियमितताएं दोबारा होने से रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुकान आरोपी की पत्नी के नाम पर संचालित होने की संभावना थी। इन परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच जरूरी है। केवल पिछली शिकायतों या लाइसेंस संबंधी कार्रवाई के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित अधिकारियों ने जानबूझकर किसी अपराध को संरक्षण दिया।
फिर भी, यह मामला दवा बिक्री की निगरानी, लाइसेंस निलंबन के प्रभाव और शिकायतों पर कार्रवाई की प्रक्रिया की समीक्षा की जरूरत सामने लाता है।
3. नशे के खिलाफ लड़ाई में स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की अलग-अलग जिम्मेदारी
पंजाब में नशे की समस्या केवल सीमा पार से आने वाली हेरोइन या अन्य अवैध मादक पदार्थों तक सीमित नहीं है। डॉक्टर के पर्चे पर मिलने वाली कुछ दवाओं का गलत इस्तेमाल और उनका अवैध वितरण भी गंभीर चुनौती है।
इस व्यवस्था में दो प्रमुख विभागों की भूमिका होती है:
स्वास्थ्य विभाग और ड्रग कंट्रोल अधिकारी: दवाओं की बिक्री, भंडारण, लाइसेंस और नियमों के अनुपालन की निगरानी करना। जिन दवाओं के लिए डॉक्टर का पर्चा अनिवार्य है, उनकी बिक्री निर्धारित नियमों के अनुसार सुनिश्चित करना।
पुलिस विभाग: अवैध नशीले पदार्थों की तस्करी, आपराधिक नेटवर्क और संबंधित अपराधों की जांच करना तथा कानून के मुताबिक कार्रवाई करना।
NDTV की रिपोर्ट में दोनों विभागों के बीच समन्वय की कमी को नशे के खिलाफ अभियान की प्रमुख कमजोरियों में गिना गया है। यदि किसी दुकान पर बार-बार शिकायतें मिलती हैं, तो निरीक्षण, लाइसेंस संबंधी कार्रवाई और आपराधिक जांच के बीच प्रभावी तालमेल होना चाहिए।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर अनियमितता दोनों विभागों की मिलीभगत का प्रमाण नहीं होती। यह तय करने के लिए रिकॉर्ड, जांच और कार्रवाई के नतीजों को देखना होगा।
4. पुलिसकर्मियों पर नशा तस्करी में शामिल होने के आरोप
नशे के खिलाफ लड़ाई की विश्वसनीयता तब प्रभावित होती है, जब कानून लागू करने वाली एजेंसियों के कुछ सदस्यों पर ही अवैध कारोबार में शामिल होने के आरोप लगते हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स में पंजाब पुलिस के कर्मचारियों से जुड़े कई मामलों का उल्लेख किया गया है। इनमें 2021 से 2024 के बीच अलग-अलग पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी और नशीले पदार्थों की बरामदगी से जुड़े मामले शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2026 में पंजाब पुलिस के एक कांस्टेबल को सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने 15 किलोग्राम हेरोइन के साथ गिरफ्तार किया। शुरुआती पूछताछ में सीमा पार तस्करी के नेटवर्क को मदद पहुंचाने के आरोपों की जांच की बात कही गई। इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगी।
इसके अतिरिक्त, पंजाब पुलिस के बर्खास्त अधिकारी राजजीत सिंह हुंदल को सितंबर 2026 में गिरफ्तार किया गया था। उनके मामले में नशीले पदार्थों से जुड़े मुकदमों के नमूनों और जांच प्रक्रियाओं में कथित हेरफेर के आरोपों का उल्लेख किया गया है।
ऐसे मामले इस बात की जरूरत दिखाते हैं कि पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो तथा दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही, कुछ व्यक्तियों के मामलों के आधार पर पूरे पुलिस विभाग को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
5. पंजाब में दवाओं के दुरुपयोग की समस्या कितनी गंभीर है?
नशे की समस्या को समझने के लिए केवल हेरोइन या अफीम के आंकड़े देखना पर्याप्त नहीं है। कुछ चिकित्सकीय दवाएं भी बिना उचित निगरानी के इस्तेमाल होने पर निर्भरता और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती हैं।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के लिए AIIMS के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर (NDDTC) द्वारा किए गए 2019 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, पंजाब में लगभग 9.93 लाख लोग शामक दवाओं (sedatives) के वर्तमान उपयोगकर्ता थे। इनमें लगभग दो लाख लोगों को इन दवाओं के उपयोग से जुड़ी समस्याओं के लिए उपचार की जरूरत थी।
इन आंकड़ों को 2026 की मौजूदा स्थिति का प्रत्यक्ष अनुमान नहीं समझना चाहिए, क्योंकि सर्वेक्षण पुराना है। फिर भी, यह बताता है कि नशे की समस्या में चिकित्सकीय दवाओं का दुरुपयोग भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।
अवैध रूप से बेची जाने वाली दवाओं में कुछ ऐसी दवाएं भी शामिल हो सकती हैं, जिनकी बिक्री चिकित्सकीय पर्चे और नियामकीय शर्तों के अधीन होती है। इसलिए केवल तस्करी रोकना पर्याप्त नहीं; दवा की आपूर्ति, मेडिकल स्टोर की निगरानी और नशे की निर्भरता से जूझ रहे लोगों के उपचार पर भी ध्यान देना जरूरी है।
6. झोटा की हत्या के बाद विरोध और प्रशासनिक कार्रवाई
झोटा की हत्या के बाद मानसा में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। परिवार और प्रदर्शनकारियों ने निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। परिवार ने अंतिम संस्कार को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट किया और कहा कि उनकी प्राथमिकता न्याय है।
मामले में कार्रवाई के तहत मानसा के सिटी-2 थाने की एसएचओ बिएंत कौर को निलंबित किया गया। पुलिस ने आरोपी की पत्नी को भी मामले में नामजद किया। पुलिस के अनुसार, मेडिकल स्टोर का लाइसेंस आरोपी की पत्नी के नाम पर था।
इन घटनाक्रमों के बीच प्रदर्शनकारियों ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की। ये प्रदर्शनकारियों की मांगें हैं; जांच किस एजेंसी को सौंपी जाएगी, यह संबंधित अधिकारियों के औपचारिक फैसले पर निर्भर करेगा।
7. केंद्र और पंजाब सरकार आमने-सामने
झोटा की हत्या ने राजनीतिक विवाद को भी बढ़ा दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब सरकार से इस मामले पर रिपोर्ट मांगे जाने की बात कही। केंद्र के गृह मंत्रालय ने इस घटना और संगरूर जिले के दिरबा में एक अन्य मामले को लेकर पंजाब सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने केंद्र की आलोचना करते हुए सीमा सुरक्षा और नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने में केंद्र की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी केंद्र और पूर्ववर्ती सरकारों पर नशे की समस्या को लेकर आरोप लगाए।
इस तरह मामला कानून-व्यवस्था की जांच से आगे बढ़कर केंद्र और राज्य सरकार के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन गया है। लेकिन राजनीतिक बयान अपने आप में किसी पक्ष के आरोपों को सिद्ध नहीं करते। जांच और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही यह तय किया जा सकता है कि कार्रवाई कहां विफल रही और किसकी क्या जिम्मेदारी बनती है।
8. पंजाब की नशा-विरोधी मुहिम को प्रभावी बनाने के लिए क्या जरूरी है?
झोटा की हत्या ने कुछ बुनियादी सवालों को सामने ला दिया है। यदि नशे के खिलाफ अभियान को प्रभावी बनाना है, तो कार्रवाई केवल छापेमारी या गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रह सकती।
- शिकायतों का रिकॉर्ड और अनुवर्ती कार्रवाई: जिन मेडिकल स्टोरों के खिलाफ बार-बार शिकायतें आती हैं, उनकी जांच और कार्रवाई का सार्वजनिक रूप से जवाबदेह रिकॉर्ड होना चाहिए।
- दवा बिक्री की निगरानी: नियंत्रित दवाओं की बिक्री, भंडारण और डॉक्टर के पर्चे के नियमों का नियमित निरीक्षण जरूरी है।
- पुलिस और स्वास्थ्य विभाग का समन्वय: शिकायतों पर साझा कार्रवाई और सूचना के आदान-प्रदान की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।
- अधिकारियों की जवाबदेही: लापरवाही या मिलीभगत के आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और प्रमाण मिलने पर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
- नशे की निर्भरता का उपचार: नशे की समस्या से जूझ रहे लोगों को चिकित्सा, पुनर्वास और सामाजिक सहायता उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।
- सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा: नशे के अवैध कारोबार की शिकायत करने वाले लोगों को धमकी या हिंसा से बचाने के लिए जोखिम के अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।
ये कदम किसी एक हत्या की जांच का विकल्प नहीं हैं। लेकिन इनसे उन व्यवस्थागत कमियों की पहचान की जा सकती है, जिनके कारण नशे की आपूर्ति और उससे जुड़े अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण कठिन हो जाता है।
निष्कर्ष: सवाल सिर्फ नशे का नहीं, जवाबदेही का भी है
परविंदर सिंह झोटा की हत्या पंजाब के लिए एक गंभीर घटना है। इसने नशे के कथित अवैध कारोबार, मेडिकल स्टोरों की निगरानी, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के बीच समन्वय तथा शिकायतों पर कार्रवाई की प्रभावशीलता को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
नशे के खिलाफ किसी भी अभियान की सफलता केवल जब्त की गई दवाओं या दर्ज मामलों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि अवैध आपूर्ति कितनी कम हुई, शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई हुई या नहीं, दोषियों को कानून के दायरे में लाया गया या नहीं और नशे से प्रभावित लोगों को उपचार मिला या नहीं।
झोटा की हत्या की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करना तत्काल आवश्यकता है। इसके साथ ही, पंजाब में नशे की समस्या से निपटने के लिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिसमें कानून लागू करने वाली एजेंसियों की विश्वसनीयता बनी रहे और अवैध कारोबार को दोबारा पनपने से रोका जा सके।





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