News Desk: भारतीय शेयर बाजार के लिए साल 2026 अब तक बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है। सेंसेक्स और निफ्टी में लगातार गिरावट के बीच निवेशकों की संपत्ति में भारी कमी आई है। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब ₹30 लाख करोड़ घट गया है। वहीं, निफ्टी 50 इस साल अब तक लगभग 14% नीचे आ चुका है। बाजार की इस कमजोरी के पीछे विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, रुपये में उतार-चढ़ाव, टैक्स से जुड़ी चिंताएं और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को अहम कारण माना जा रहा है।
2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे खराब साल का खतरा
NDTV की 27 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, निफ्टी 50 में सालाना आधार पर करीब 14% की गिरावट दर्ज की गई है। मौजूदा रुझान जारी रहने पर यह 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद इसकी सबसे खराब सालाना गिरावट हो सकती है।
रिपोर्ट में ब्लूमबर्ग के हवाले से यह भी कहा गया है कि इंडोनेशिया को छोड़कर भारत इस साल प्रमुख वैश्विक शेयर बाजारों में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला बाजार रहा है। यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय बाजार को वैश्विक निवेशकों के लिए एक आकर्षक विकल्प माना जाता रहा था।
हालांकि, साल के अंत तक बाजार का प्रदर्शन कैसा रहता है, यह आने वाले महीनों में कंपनियों के नतीजों, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और निवेशकों के भरोसे पर निर्भर करेगा।
विदेशी निवेशकों ने निकाले ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा
बाजार में गिरावट का एक बड़ा कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली है। NDTV के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 2026 में भारतीय बाजार से करीब 32 अरब डॉलर यानी ₹3 लाख करोड़ से अधिक की रकम निकाली है।
अकेले 1 से 15 अक्टूबर के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से शुद्ध रूप से ₹47,955 करोड़ की निकासी की। लगातार हो रही इस बिकवाली ने शेयरों की कीमतों पर दबाव बढ़ाया है।
जब विदेशी निवेशक बड़े पैमाने पर शेयर बेचते हैं, तो बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है। इससे प्रमुख सूचकांकों में गिरावट के साथ-साथ निवेशकों की संपत्ति भी प्रभावित होती है।
सेंसेक्स और निफ्टी के बड़े शेयरों में भारी गिरावट
बाजार की कमजोरी केवल कुछ कंपनियों तक सीमित नहीं है। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, निफ्टी 50 में शामिल 50 कंपनियों में से 38 के शेयर इस साल गिरावट में कारोबार कर रहे थे, जबकि 25 शेयरों में कम से कम 10% की गिरावट दर्ज की गई।
रिपोर्ट में प्रमुख शेयरों की स्थिति इस प्रकार बताई गई है:
- ITC: लगभग 36% की गिरावट
- मारुति सुजुकी: लगभग 34% की गिरावट
- जियो फाइनेंशियल सर्विसेज: लगभग 31% की गिरावट
- HDFC लाइफ इंश्योरेंस: लगभग 31% की गिरावट
- HDFC बैंक: लगभग 30% की गिरावट
ये आंकड़े रिपोर्ट में बताए गए साल-दर-साल बदलाव पर आधारित हैं। शेयरों की कीमतों में आगे भी बदलाव हो सकता है।
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी बिकवाली
बाजार की गिरावट का असर मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों पर भी पड़ा है। ये शेयर कई बार बड़ी कंपनियों के मुकाबले ज्यादा उतार-चढ़ाव दिखाते हैं, इसलिए बाजार में घबराहट बढ़ने पर इनमें गिरावट अधिक तेज हो सकती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मिडकैप शेयरों में KPIT Technologies लगभग 54%, आदित्य बिड़ला फैशन एंड रिटेल 50% और PB Fintech 44% नीचे थे। वहीं, स्मॉलकैप शेयरों में KEC International में करीब 56%, Inox Wind में 52% और Jupiter Wagons में 49% की गिरावट दर्ज की गई।
निफ्टी मिडकैप 100 में इस साल लगभग 8% की गिरावट रही, जिसमें करीब 6 प्रतिशत अंक की गिरावट अकेले हालिया सप्ताह में आई। रिपोर्ट के मुताबिक, उस सप्ताह निफ्टी मिडकैप 100 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 के संयुक्त समूह में केवल छह शेयर ही बढ़त के साथ बंद हुए।
विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा क्यों निकाल रहे हैं?
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें टैक्स की दरें, रुपये की कमजोरी, निवेश पर मिलने वाले रिटर्न की अनिश्चितता और दूसरे देशों के बाजारों में उपलब्ध अवसर शामिल हैं।
1. शेयरों पर टैक्स का असर
जुलाई 2024 के केंद्रीय बजट में निर्दिष्ट सूचीबद्ध इक्विटी निवेश पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (LTCG) टैक्स की दर 10% से बढ़ाकर 12.5% कर दी गई थी। वहीं, अल्पकालिक पूंजीगत लाभ (STCG) टैक्स की दर 15% से बढ़ाकर 20% की गई थी, जो लागू शर्तों के अधीन है।
Giottus.com के CEO विक्रम सुब्बुराज ने मीडिया से बातचीत में कहा कि इक्विटी निवेश पर अधिक टैक्स, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और टैक्स देनदारियों से जुड़ी अनिश्चितता विदेशी निवेशकों के लिए चुनौतियां पैदा कर रही हैं। हालांकि, केवल टैक्स बढ़ोतरी को बाजार से बड़े पैमाने पर निकासी का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।
2. रुपये में उतार-चढ़ाव
विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों में पैसा लगाते समय रुपये और डॉलर के बीच विनिमय दर को भी ध्यान में रखते हैं। यदि निवेश की अवधि के दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो डॉलर में हिसाब लगाने पर उनका रिटर्न घट सकता है।
इस वजह से भारतीय कंपनियों के शेयरों में संभावित मुनाफे के बावजूद विदेशी निवेशक अपने निवेश को लेकर सतर्क हो सकते हैं।
3. वैश्विक बाजारों में बेहतर विकल्प
विदेशी निवेशक भारत के अलावा अमेरिका और अन्य बाजारों में भी निवेश के अवसर देखते हैं। वैश्विक ब्याज दरें, बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न, कंपनियों के मूल्यांकन और भू-राजनीतिक जोखिम उनके फैसलों को प्रभावित करते हैं।
यदि निवेशकों को दूसरे बाजारों में तुलनात्मक रूप से बेहतर जोखिम-रिटर्न अनुपात दिखाई देता है, तो वे भारतीय शेयरों से पैसा निकाल सकते हैं।
क्या भारतीय बाजार में सुधार की उम्मीद खत्म हो गई है?
लगातार गिरावट के बावजूद यह कहना सही नहीं होगा कि बाजार में सुधार की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है। शेयर बाजार का प्रदर्शन कंपनियों की कमाई, अर्थव्यवस्था की रफ्तार, महंगाई, ब्याज दरों और विदेशी निवेशकों के रुख जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 15 अक्टूबर तक विदेशी निवेशकों के पास भारतीय शेयरों की लगभग ₹65.94 लाख करोड़ की संपत्ति कस्टडी में थी। इससे स्पष्ट होता है कि विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार में अब भी बड़ी हिस्सेदारी है और उनके निवेश संबंधी फैसले बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके अलावा, शेयर बाजार के सूचकांकों में गिरावट का असर सभी कंपनियों और सभी निवेशकों पर एक जैसा नहीं होता। किसी निवेशक के पोर्टफोलियो का प्रदर्शन इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसने किन शेयरों में, किस कीमत पर और कितने समय के लिए निवेश किया है।
निवेशकों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
बाजार में तेज गिरावट के दौरान जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय निवेशकों को अपनी वित्तीय जरूरतों, जोखिम सहने की क्षमता और निवेश की अवधि का आकलन करना चाहिए। किसी शेयर में बड़ी गिरावट आना अपने आप में यह संकेत नहीं है कि वह सस्ता या खरीदने लायक हो गया है।
इसी तरह, बाजार में गिरावट जारी रहने का मतलब यह भी नहीं है कि हर निवेशक को अपने शेयर बेच देने चाहिए। किसी भी निवेश संबंधी फैसले से पहले कंपनी के कारोबार, वित्तीय स्थिति, मूल्यांकन और अपने वित्तीय लक्ष्यों को देखना जरूरी है।
निष्कर्ष: बाजार की दिशा विदेशी निवेश और वैश्विक परिस्थितियों पर भी निर्भर
साल 2026 में भारतीय शेयर बाजार के कमजोर प्रदर्शन ने निवेशकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की है। निफ्टी 50 में लगभग 14% की गिरावट, बीएसई कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में करीब ₹30 लाख करोड़ की कमी और विदेशी निवेशकों की भारी निकासी इस दबाव को दिखाती है।
आगे बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली कितनी कम होती है, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां कैसी रहती हैं और भारतीय कंपनियों के नतीजे निवेशकों की उम्मीदों पर कितने खरे उतरते हैं। फिलहाल, 2008 के बाद सबसे खराब साल की आशंका एक संभावना है- अंतिम निष्कर्ष नहीं।





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