News Desk: Uniform Civil Code यानी UCC एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी 21 BJP-NDA शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। लेकिन शाह के इस बड़े लक्ष्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि NDA के भीतर से आती दिखाई दे रही है।
अमित शाह ने क्या कहा?
अमित शाह ने 13 सितंबर को कहा कि NDA की सरकारें 2029 से पहले अपने-अपने राज्यों में UCC लागू करेंगी। उन्होंने इसे BJP के लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताया और Triple Talaq, Article 370 तथा आपराधिक कानूनों में बदलाव जैसे कदमों का भी उल्लेख किया।
UCC का मूल विचार है कि धर्म के आधार पर अलग-अलग personal laws की जगह विवाह, तलाक, विरासत और दूसरे व्यक्तिगत मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था हो।
लेकिन NDA में ही अलग-अलग आवाजें क्यों?
शाह के बयान के बाद NDA के सहयोगी दलों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं।
सबसे ज्यादा ध्यान JD(U) के रुख पर है। पार्टी ने संकेत दिया है कि बिहार में UCC लागू करने का फैसला बिना व्यापक चर्चा और सहमति के नहीं किया जाना चाहिए। JD(U) का राष्ट्रीय स्तर पर UCC को लेकर रुख और बिहार में इसकी implementation को लेकर रुख अलग हो सकता है—यही BJP के लिए राजनीतिक चुनौती है।
दूसरी तरफ TDP ने तत्काल विरोध के बजाय चर्चा और विचार-विमर्श के बाद निर्णय की बात कही है। वहीं शिवसेना (शिंदे गुट) और Hindustani Awam Morcha जैसे सहयोगियों ने UCC के समर्थन में सकारात्मक रुख दिखाया है।
यानी NDA में अभी पूर्ण consensus नहीं है।
UCC लागू करना इतना आसान क्यों नहीं?
UCC सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं है। इसका सीधा असर marriage, divorce, inheritance और adoption जैसे personal-law matters पर पड़ेगा।
भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए लंबे समय से अलग personal-law frameworks मौजूद हैं। ऐसे में एक समान कानून तैयार करने के लिए सिर्फ राजनीतिक इच्छा नहीं, बल्कि विस्तृत कानूनी प्रक्रिया, राज्यों की भूमिका और सामाजिक सहमति भी महत्वपूर्ण होगी।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि personal laws संविधान की Concurrent List से जुड़े विषय हैं, इसलिए राज्यों के स्तर पर भी कानून बनाने की गुंजाइश मौजूद है। इसी वजह से BJP अब केवल संसद के रास्ते पर निर्भर रहने के बजाय राज्यों के जरिए UCC का विस्तार करने की रणनीति पर जोर देती दिख रही है।
अभी कितने राज्यों में UCC?
फिलहाल उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य है। इसके अलावा गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे BJP-शासित राज्यों में भी UCC को लेकर कानून या प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है, हालांकि सभी राज्यों में स्थिति एक जैसी नहीं है।
यही मॉडल अब दूसरे NDA राज्यों तक ले जाने की कोशिश है।
BJP के लिए 2029 से पहले क्यों अहम?
UCC BJP के लिए केवल governance reform नहीं, बल्कि लंबे समय से उसके प्रमुख राजनीतिक-वैचारिक मुद्दों में शामिल रहा है। पार्टी ने इसे अपने चुनावी घोषणापत्रों में भी प्रमुखता दी है।
2029 से पहले 21 राज्यों में इसे लागू करने का लक्ष्य बताता है कि BJP इसे अगले लोकसभा चुनाव से पहले एक बड़े national political issue के रूप में स्थापित करना चाहती है।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल है- क्या BJP अपने सहयोगियों को साथ लेकर चल पाएगी?
अगर JDU जैसे महत्वपूर्ण सहयोगी राज्य स्तर पर आपत्ति जताते हैं, तो BJP को UCC के implementation में राजनीतिक बातचीत और consensus-building पर ज्यादा जोर देना पड़ सकता है।
2029 तक की असली चुनौती
अमित शाह का लक्ष्य स्पष्ट है- 21 NDA राज्यों में UCC।
लेकिन NDA की राजनीति में फिलहाल तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। कुछ सहयोगी खुलकर समर्थन कर रहे हैं, कुछ बातचीत के बाद फैसला लेना चाहते हैं और JDU जैसे दल राज्यों में इसे लेकर सावधानी बरत रहे हैं।
इसलिए अब UCC की असली लड़ाई सिर्फ BJP बनाम विपक्ष नहीं होगी।
आने वाले समय में सवाल यह होगा कि क्या BJP अपने ही NDA सहयोगियों के अलग-अलग हितों और राजनीतिक समीकरणों को साधते हुए 2029 से पहले ‘एक देश, एक समान नागरिक कानून’ के अपने लक्ष्य को पूरा कर पाएगी?





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