News Desk: महाराष्ट्र में विधान परिषद की पांच सीटों के लिए होने जा रहे चुनाव ने सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर चल रहे मतभेदों को सामने ला दिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और एनसीपी नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर गठबंधन की एकजुटता का भरोसा जता रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उम्मीदवारों के चयन, सीटों के बंटवारे और बागी नेताओं को लेकर खींचतान जारी है। स्थिति यह है कि कुछ सीटों पर सहयोगी दलों के नेता एक-दूसरे के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ खड़े हैं या विपक्षी उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं।
नागपुर में बीजेपी के सामने अपनी खोई सीट वापस पाने की चुनौती
नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। पार्टी ने यहां पूर्व विधायक सुधाकर कोहले को उम्मीदवार बनाया है, जिनका मुकाबला कांग्रेस के मौजूदा विधान परिषद सदस्य अभिजीत वंजारी से है।
नागपुर सीट पर बीजेपी और उसके पूर्ववर्ती जनसंघ का 58 वर्षों तक प्रतिनिधित्व रहा था। लेकिन 2020 के चुनाव में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने बीजेपी उम्मीदवार संदीप जोशी को हराकर यह सीट जीत ली थी। अब बीजेपी इसे वापस हासिल करने की कोशिश कर रही है।
उम्मीदवार के चयन से पार्टी के भीतर असंतोष भी सामने आया। पूर्व विधायक अनिल सोले ने टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। हालांकि, वरिष्ठ नेताओं के समझाने के बाद उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का समर्थन करने पर सहमति जताई।
सोले ने उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले चयन में नेताओं से सलाह ली जाती थी, लेकिन अब फैसले ऊपर से किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस ने सोले के पार्टी के प्रति समर्पण की सराहना की।
पुणे में बीजेपी और शिंदे सेना आमने-सामने
महायुति के भीतर सबसे स्पष्ट टकराव पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। सीट बंटवारे के समझौते के तहत बीजेपी ने कौस्तुभ गवड़े को अपना उम्मीदवार बनाया है, लेकिन एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने निर्दलीय उम्मीदवार चंद्रकांत सानप को समर्थन दिया है।
इससे गठबंधन के दोनों सहयोगी एक ही सीट पर अलग-अलग उम्मीदवारों के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस ने सहयोगी दलों के नेताओं से गठबंधन के आधिकारिक फैसलों का सम्मान करने की अपेक्षा जताई है, जबकि शिवसेना की ओर से सीट बंटवारे में अधिक भागीदारी की मांग उठती रही है।
छत्रपति संभाजीनगर में एनसीपी की उम्मीदवारी को चुनौती
छत्रपति संभाजीनगर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में महायुति ने एनसीपी के उम्मीदवार सतीश चव्हाण को मैदान में उतारा है। लेकिन यहां भी सहयोगी दलों के बीच सहमति नहीं बन सकी।
शिवसेना के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार ने एनसीपी उम्मीदवार के बजाय एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रत्याशी डॉ. प्रतापसिंह पाटिल का समर्थन करने की घोषणा की। सत्तार ने एनसीपी के साथ शिवसेना के पुराने राजनीतिक मतभेदों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि उनकी पार्टी अब एनसीपी के उम्मीदवार का समर्थन क्यों करे।
यह घटनाक्रम बताता है कि राज्य स्तर पर हुआ सीट समझौता स्थानीय नेताओं की राजनीतिक प्राथमिकताओं और पुराने प्रतिद्वंद्विताओं को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पा रहा है।
अमरावती में शिवसेना के उम्मीदवार के खिलाफ बीजेपी के बागी
अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में महायुति ने शिवसेना के उम्मीदवार किरण सरनाईक को समर्थन दिया है। लेकिन उनके नाम पर बीजेपी के भीतर असंतोष सामने आया और पार्टी के कुछ पदाधिकारियों ने उनके खिलाफ नामांकन दाखिल कर दिया।
बीजेपी ने बगावत करने वाले चंद्रकांत भोयर, संगीता बोंडे-शिंदे और सुनील पवार को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बावजूद यह प्रकरण सहयोगी दल के उम्मीदवार को लेकर बीजेपी के कुछ नेताओं की नाराजगी को उजागर करता है।
सीट बंटवारे का समझौता भी नहीं रोक पाया मतभेद
महायुति ने पांच सीटों के लिए 3:1:1 का फॉर्मूला तय किया है। इसके तहत बीजेपी तीन सीटों—नागपुर स्नातक, पुणे स्नातक और पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र—पर चुनाव लड़ रही है। शिवसेना को अमरावती शिक्षक सीट और एनसीपी को छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीट मिली है। हालांकि, सीट बंटवारे के इसी समझौते से एनसीपी और शिवसेना के बीच नाराजगी भी जुड़ी रही है। एनसीपी नेता सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल पहले पुणे स्नातक सीट पार्टी को नहीं दिए जाने पर असंतोष जता चुके हैं। शिवसेना भी पुणे शिक्षक और संभाजीनगर स्नातक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती थी।
मतभेदों को सुलझाने के लिए बीजेपी नेता चंद्रशेखर बावनकुले की अध्यक्षता में गठबंधन समन्वय समिति भी बनाई गई थी। लेकिन विधान परिषद चुनावों में सामने आए विवाद बताते हैं कि समन्वय स्थापित करना अब भी चुनौती बना हुआ है।
विपक्षी महाविकास अघाड़ी भी अंदरूनी खींचतान से अछूती नहीं
सिर्फ सत्तारूढ़ महायुति ही नहीं, विपक्षी महाविकास अघाड़ी में भी उम्मीदवारों को लेकर मतभेद सामने आए हैं। कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के बीच कुछ सीटों पर दावेदारी को लेकर सहमति बनाना मुश्किल रहा।
अमरावती में शिवसेना (यूबीटी) ने अपना उम्मीदवार उतारते हुए कांग्रेस पर एकतरफा तरीके से प्रत्याशी घोषित करने का आरोप लगाया। पुणे सहित कुछ क्षेत्रों में भी टिकट वितरण से नाराज नेताओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया। इस तरह दोनों गठबंधनों के सामने आधिकारिक उम्मीदवारों के पक्ष में अपने नेताओं को एकजुट रखने की चुनौती है।
चुनाव कब और कितने मतदाता करेंगे मतदान?
महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के लिए मतदान 23 अक्टूबर 2026 को होना है, जबकि मतगणना 27 अक्टूबर को निर्धारित है। निर्वाचन अधिकारियों के मुताबिक, चुनाव में 182 उम्मीदवार मैदान में हैं। इन सीटों के लिए 10.68 लाख से अधिक पंजीकृत मतदाता मतदान करने के पात्र हैं और इसके लिए 2,419 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।
क्या चुनाव के बाद भी महायुति के मतभेद बने रहेंगे?
इन चुनावों में महायुति के सामने दो स्तरों पर चुनौती है। पहला, पांच सीटों पर अपने उम्मीदवारों के पक्ष में पर्याप्त समर्थन जुटाना; दूसरा, सहयोगी दलों और उनके स्थानीय नेताओं के बीच राजनीतिक तालमेल बनाए रखना।
मुख्यमंत्री फडणवीस और उपमुख्यमंत्री शिंदे ने सभी पांच सीटें जीतने का भरोसा जताया है। लेकिन उम्मीदवारों को लेकर असंतोष और सहयोगी दलों द्वारा अलग उम्मीदवारों को समर्थन देने की घटनाएं गठबंधन के सामने वास्तविक समन्वय संबंधी सवाल खड़े करती हैं।
निष्कर्ष: महाराष्ट्र के ये विधान परिषद चुनाव केवल पांच सीटों का मुकाबला नहीं हैं। इनके जरिए गठबंधन के भीतर उम्मीदवार चयन, सीटों पर दावेदारी और सहयोगी दलों के बीच शक्ति-संतुलन की परीक्षा भी हो रही है। चुनाव परिणाम बताएंगे कि इन मतभेदों का सीटों पर कितना असर पड़ा, जबकि गठबंधन की दीर्घकालिक एकजुटता का आकलन आगे के राजनीतिक घटनाक्रम से ही किया जा सकेगा।





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