News Desk: अमेरिका में नौकरी करना अब सिर्फ नौकरी पाने की चुनौती नहीं रह गई है- नौकरी बचाए रखना भी immigration status बचाए रखने का सवाल बन सकता है। ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिकी Department of Homeland Security (DHS) एक ऐसे प्रस्ताव पर काम कर रहा है, जो H-1B कर्मचारियों को नौकरी छूटने के बाद मिलने वाली मौजूदा 60 दिन की grace period को खत्म कर सकता है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो नौकरी जाने के बाद अमेरिका में नई नौकरी खोजने का समय लगभग खत्म हो सकता है और प्रभावित कर्मचारी तथा उनके dependants को जल्द देश छोड़ना पड़ सकता है।
60 दिन की राहत आखिर है क्या?
मौजूदा सिस्टम में H-1B वर्कर्स की नौकरी खत्म होने पर उसे आम तौर पर 60 दिनों तक, या मौजूदा authorised stay की अवधि खत्म होने तक जो पहले हो, अमेरिका में रहने का अवसर मिलता है। इस दौरान वह नया employer ढूंढ सकता है और अपनी immigration स्थिति को बचाने के लिए आवश्यक प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
लेकिन प्रस्तावित नियम इस सुरक्षा कवच को हटाने की दिशा में है। इसका मतलब यह होगा कि “आज नौकरी गई, कल immigration संकट” जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि अभी यह केवल प्रस्ताव है; अंतिम नियम बनने से पहले अमेरिकी regulatory process पूरा होना जरूरी है।
भारत के लिए यह खबर इतनी बड़ी क्यों है?
क्योंकि H-1B program में भारतीयों की हिस्सेदारी असाधारण रूप से बड़ी है।
USCIS के FY2025 आंकड़ों के अनुसार, भारत के नागरिकों को 2,83,772 H-1B approvals मिले—कुल approvals का लगभग 70%। चीन 49,161 approvals के साथ काफी पीछे रहा। उसी साल कुल H-1B petitions के करीब 4.06 लाख approvals हुए।
यानी अगर अमेरिकी H-1B rules में नौकरी छूटने के बाद रहने की सुरक्षा कम होती है, तो इसका सबसे बड़ा असर पड़ने वाले समूहों में भारतीय IT और tech professionals भी होंगे।
लेकिन H-1B की मांग अभी भी इतनी ज्यादा क्यों है?
यहां एक दिलचस्प आंकड़ा सामने आता है।
FY2026 के लिए USCIS को 3,43,981 eligible H-1B registrations मिले, जबकि annual cap सिर्फ 85,000 है। यानी demand और उपलब्ध regular cap के बीच अंतर कई गुना है। FY2025 में eligible registrations 4,70,342 थीं।
दूसरे शब्दों में—
अमेरिका में H-1B के लिए competition पहले ही जबरदस्त है, और अब नौकरी जाने के बाद survival window भी छोटी हो सकती है।
AI और layoffs ने खतरा और बढ़ाया
यह बदलाव ऐसे समय में प्रस्तावित है जब अमेरिकी technology sector खुद AI-driven restructuring और layoffs से गुजर रहा है। कंपनियां automation और AI में निवेश बढ़ा रही हैं, जबकि कई traditional technology roles में headcount घटाया जा रहा है।
भारतीय IT companies के लिए भी तस्वीर बदल रही है। FY2025 में सात प्रमुख India-based IT firms को initial employment के लिए सिर्फ 4,573 H-1B approvals मिले - 2015 के मुकाबले करीब 70% कम। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका में भारतीय कंपनियों की traditional offshore-to-onsite staffing strategy कमजोर हो रही है, जबकि अमेरिकी tech कंपनियां सीधे highly skilled foreign talent को hire कर रही हैं।
क्या हर H-1B holder को तुरंत अमेरिका छोड़ना पड़ेगा?
नहीं और यही distinction बेहद जरूरी है।
अभी 60-day grace period खत्म नहीं हुई है। यह DHS का प्रस्तावित बदलाव है। इसके अलावा किसी कर्मचारी के पास अलग immigration pathway, नया approved petition या अन्य वैध status हो सकता है, इसलिए हर व्यक्ति की स्थिति एक जैसी नहीं होगी।
लेकिन अगर प्रस्ताव लागू हुआ, तो job loss के बाद time pressure dramatically बढ़ जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल: अमेरिका को फायदा या नुकसान?
अमेरिकी प्रशासन का तर्क immigration enforcement और program integrity के इर्द-गिर्द है। लेकिन businesses और immigration advocates की चिंता है कि अचानक job-loss protection हटाने से highly skilled global talent के लिए अमेरिका कम आकर्षक हो सकता है।
और भारत के लिए मैसेज बिल्कुल साफ है-
H-1B अब सिर्फ अमेरिका जाने का visa नहीं है; यह career security का भी सवाल बन चुका है।
जब एक तरफ AI नौकरियों की प्रकृति बदल रहा है, दूसरी तरफ layoffs बढ़ रहे हैं और तीसरी तरफ immigration rules कठोर हो रहे हैं, तब भारतीय tech professionals के लिए शायद सबसे जरूरी सवाल यह नहीं रहेगा कि “अमेरिका कैसे जाएं?”
बल्कि- “अगर नौकरी चली गई, तो अमेरिका में हमारे पास कितने दिन बचेंगे?”
और प्रस्तावित H-1B बदलाव इसी सवाल को पहले से कहीं ज्यादा गंभीर बना सकता है।





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