News Desk: दिवाली से पहले दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने सीमित अवधि के लिए प्रमाणित ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी है। सवाल यह है कि क्या ग्रीन पटाखे दिल्ली की प्रदूषित हवा को साफ रखने में मदद कर पाएंगे, या फिर ‘ग्रीन’ नाम के बावजूद वे भी प्रदूषण का एक बड़ा कारण बनेंगे?
वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में कुछ प्रदूषकों का उत्सर्जन कम करने के लिए तैयार किए जाते हैं। लेकिन इन्हें पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं माना जा सकता। पटाखों से निकलने वाले PM2.5, PM10, गैसें और धातु युक्त कण हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
दिल्ली की हवा पहले से ही बेहद खराब
दिवाली से पहले राजधानी की वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है। 3 नवंबर की सुबह दिल्ली का औसत AQI 331 दर्ज किया गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। वहीं, आठ मॉनिटरिंग स्टेशन ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गए, जहां AQI 400 से ऊपर दर्ज हुआ।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक, बवाना, पंजाबी बाग, रोहिणी, विवेक विहार, नरेला, जहांगीरपुरी, अलीपुर और दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) के आसपास प्रदूषण का स्तर गंभीर रहा। नोएडा में भी AQI 307 दर्ज किया गया।
वायु गुणवत्ता के बिगड़ने के बीच वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने दिल्ली-एनसीआर में GRAP-2 लागू कर दिया है। इसके तहत सड़क की धूल कम करने, मैकेनिकल स्वीपिंग, पानी का छिड़काव और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों को कब दी अनुमति?
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 7 और 8 नवंबर को प्रमाणित ग्रीन पटाखे जलाने की सीमित अनुमति दी है। अदालत के आदेश के अनुसार, पटाखे सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे तक ही जलाए जा सकेंगे।
यह छूट केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखों के लिए है। बोरियम युक्त पटाखों, पारंपरिक पटाखों और लंबी लड़ियों की बिक्री तथा इस्तेमाल पर रोक रहेगी। 9 नवंबर से पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध फिर लागू होगा।
अदालत ने अस्पतालों, नर्सिंग होम, स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और अधिसूचित साइलेंस जोन के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाने पर भी रोक लगाई है।
आखिर क्या होते हैं ग्रीन पटाखे?
ग्रीन पटाखे वैज्ञानिक रूप से तैयार किए गए ऐसे पटाखे हैं, जिनमें पारंपरिक पटाखों की तुलना में कुछ हानिकारक रसायनों और कच्चे माल की मात्रा कम की जाती है। इन्हें CSIR-NEERI यानी वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद की राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्था ने विकसित किया है।
इनमें रासायनिक संरचना में बदलाव, कुछ पदार्थों का कम इस्तेमाल और उत्सर्जन को नियंत्रित करने वाले तत्वों का उपयोग किया जा सकता है। कुछ फॉर्मूलेशन में जिओलाइट और आयरन ऑक्साइड जैसे पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है।
CSIR-NEERI के मानकों के मुताबिक, ग्रीन पटाखों को समान श्रेणी के पारंपरिक पटाखों के मुकाबले कम पार्टिकुलेट मैटर उत्सर्जित करना होता है। कुछ श्रेणियों में कम से कम 30 प्रतिशत पार्टिकुलेट मैटर की कमी या PM उत्सर्जन में कम से कम 20 प्रतिशत कमी के साथ गैसीय उत्सर्जन में 10 प्रतिशत कमी का मानक निर्धारित है।
क्या ग्रीन पटाखे सच में प्रदूषण कम करते हैं?
ग्रीन पटाखे कुछ प्रदूषकों का उत्सर्जन कम कर सकते हैं, लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि वे हवा को प्रदूषित नहीं करते।
2023 में Environmental Pollution जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में आयरन ऑक्साइड और जिओलाइट जैसे पदार्थों से तैयार कुछ विशेष पटाखों का परीक्षण किया गया। अध्ययन में परीक्षण किए गए उत्पादों से पार्टिकुलेट मैटर और बोरियम उत्सर्जन में 30 से 60 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई।
हालांकि, ये परिणाम उन खास फॉर्मूलेशन पर आधारित थे जिनका अध्ययन किया गया। इन्हें बाजार में मौजूद हर ग्रीन पटाखे के लिए समान परिणाम की गारंटी नहीं माना जा सकता।
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है—कितने पटाखे जलाए जाते हैं। यदि एक पटाखा कम प्रदूषण फैलाता है, लेकिन उसकी जगह कई गुना अधिक पटाखे जलाए जाते हैं, तो कुल प्रदूषण का स्तर फिर भी बढ़ सकता है। इसलिए कम उत्सर्जन वाला उत्पाद अपने आप शहर की हवा को साफ नहीं कर देता।
पटाखों से निकलने वाले PM2.5 और PM10 क्यों हैं खतरनाक?
पटाखे जलने पर हवा में PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कणों के साथ गैसें और धातु युक्त कण भी निकल सकते हैं।
PM2.5 आकार में बेहद छोटे कण होते हैं, जो सांस के जरिए फेफड़ों के गहरे हिस्से तक पहुंच सकते हैं। PM10 भी सांस से शरीर में प्रवेश कर श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
दिवाली के समय दिल्ली में पहले से मौजूद वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, पराली जलाने से आने वाला प्रदूषण और मौसम की स्थिर परिस्थितियां हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। कम हवा और प्रदूषकों के फैलाव में कमी के कारण पटाखों से निकलने वाला प्रदूषण लंबे समय तक वातावरण में बना रह सकता है।
ग्रीन पटाखों की पहचान कैसे करें?
दिल्ली-एनसीआर में केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल की अनुमति है। ऐसे उत्पादों की पहचान के लिए उपभोक्ताओं को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:
· पटाखे के पैकेट पर CSIR-NEERI का लोगो और उत्पाद-विशिष्ट QR कोड देखें।
· QR कोड स्कैन कर उत्पाद और निर्माता की प्रमाणिकता जांचें।
· पैकेट सीलबंद होना चाहिए।
· केवल अधिकृत और प्रमाणित निर्माता के उत्पाद खरीदें।
· पारंपरिक पटाखों को ग्रीन पटाखों के नाम पर बेचे जाने की आशंका को देखते हुए सावधानी बरतें।
सिर्फ पैकेट पर ‘ग्रीन’ लिखा होना प्रमाणिकता की गारंटी नहीं है।
क्या ग्रीन पटाखे दिल्ली की हवा को साफ रख पाएंगे?
इसका जवाब केवल पटाखों के प्रकार पर निर्भर नहीं करता। उत्सर्जन में कमी, जलाए जाने वाले पटाखों की संख्या, प्रमाणित उत्पादों की उपलब्धता और नियमों के पालन से कुल असर तय होगा।
दिवाली के दौरान प्रदूषण पहले से ही कई स्रोतों से बढ़ता है। ऐसे में ग्रीन पटाखे कुछ उत्सर्जन कम कर सकते हैं, लेकिन दिल्ली की वायु गुणवत्ता को सामान्य रखने का अकेला समाधान नहीं हैं।
सख्त निगरानी, पारंपरिक पटाखों की अवैध बिक्री पर रोक, वाहनों और सड़क की धूल से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना और नागरिकों की जिम्मेदार भागीदारी—ये सभी कदम अहम हैं।
निष्कर्ष: ‘ग्रीन’ का मतलब प्रदूषण-मुक्त नहीं
ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाने के उद्देश्य से विकसित किए गए हैं। लेकिन इनके इस्तेमाल से भी हवा में सूक्ष्म कण और अन्य प्रदूषक पहुंच सकते हैं। इसलिए ‘ग्रीन’ शब्द को पूरी तरह सुरक्षित या प्रदूषण-मुक्त होने के अर्थ में नहीं लेना चाहिए।
दिल्ली में पहले से खराब हवा के बीच दिवाली के दौरान पटाखों का प्रभाव उत्पाद की गुणवत्ता, इस्तेमाल की मात्रा और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। सीमित समय की अनुमति और प्रमाणन व्यवस्था के बावजूद प्रदूषण कम करने के लिए नियमों का पालन और सावधानी जरूरी है।





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