News Desk: दिल्ली का जंतर-मंतर दशकों से सरकारों के खिलाफ आवाज उठाने, न्याय की मांग करने और जन आंदोलनों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का प्रमुख केंद्र रहा है। लेकिन अब इस ऐतिहासिक प्रदर्शन स्थल के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए बेहतर सुविधाओं वाले किसी वैकल्पिक स्थल की पहचान करने पर विचार करने को कहा है। ऐसे में सवाल है—क्या जंतर-मंतर की भूमिका बदलने वाली है, और अगर ऐसा हुआ तो लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों का नया ठिकाना कहां होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
9 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की व्यवस्था पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताई। अदालत के सामने यह सुझाव आया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए ऐसी दूसरी जगह निर्धारित की जाए, जहां जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों।
अदालत की टिप्पणी में पेयजल, शौचालय, चिकित्सा सहायता और अन्य बुनियादी सुविधाओं वाले स्थल की जरूरत पर जोर था। दिल्ली पुलिस आयुक्त और संबंधित अधिकारियों से वैकल्पिक स्थल पर विचार करने को कहा गया।
ध्यान देने वाली बात: यह जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश नहीं था। फिलहाल मुद्दा यह है कि प्रदर्शन के लिए मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त है या किसी बेहतर वैकल्पिक स्थल की जरूरत है।
CJP के प्रदर्शन से क्यों बढ़ी बहस?
यह चर्चा ऐसे समय तेज हुई है, जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन का आह्वान किया। दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर के प्रस्तावित प्रदर्शन को अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
इसके बाद दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। रॉयटर्स के अनुसार, शनिवार को 2,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई और सार्वजनिक परिवहन पर भी प्रतिबंध लगाए गए।
11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रतिबंधों से जुड़ी याचिकाओं पर विशेष सुनवाई की। अदालत ने कहा कि जहां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए जरूरी न हो, वहां बैरिकेड हटाए जाएं और लोगों की आवाजाही सामान्य की जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार कानून के दायरे में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
इस घटनाक्रम ने दो महत्वपूर्ण सवाल सामने रखे हैं-प्रदर्शनकारियों को अपनी बात रखने के लिए उचित जगह और अवसर कैसे मिले, और आम लोगों की आवाजाही तथा सार्वजनिक व्यवस्था को कैसे बनाए रखा जाए?
जंतर-मंतर आखिर प्रदर्शन स्थल कैसे बना?
जंतर मंतर का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों से नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान से भी जुड़ा है। इसका निर्माण 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने खगोलीय गणनाओं और आकाशीय पिंडों के अध्ययन के लिए कराया था। बाद के दशकों में इसके आसपास का इलाका राजनीतिक और सामाजिक विरोध का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
1990 के दशक की शुरुआत में दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों के लिए उपलब्ध स्थानों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बदलाव हुए। 1993 के आसपास प्रदर्शन बोट क्लब क्षेत्र से हटकर जंतर-मंतर रोड की ओर स्थानांतरित होने लगे। तब से यह जगह कई आंदोलनों के लिए प्रमुख केंद्र बनी रही।
जंतर-मंतर से उठे वे आंदोलन, जिन्होंने देश का ध्यान खींचा
2011 - अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
लोकपाल कानून की मांग को लेकर हुए आंदोलन ने देशव्यापी चर्चा पैदा की। इसी आंदोलन से जुड़े कई चेहरे बाद में राजनीति में भी सक्रिय हुए।
2017 - तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन
कर्ज, सूखा राहत और कृषि संकट से जुड़े मुद्दों को लेकर किसानों ने कई सप्ताह तक प्रदर्शन किया। उनके प्रतीकात्मक विरोध ने राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा।
2019 - नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन
CAA के विरोध में जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में लोग जुटे। नागरिकता, संवैधानिक अधिकार और सरकार की नीतियां राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनीं।
2023 - पहलवानों का धरना
विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया सहित पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन प्रमुख के खिलाफ आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की। यह आंदोलन लंबे समय तक सुर्खियों में रहा।
इन उदाहरणों से साफ है कि जंतर-मंतर केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का माध्यम भी रहा है।
क्या पहले भी प्रदर्शन स्थल बदलने की कोशिश हुई थी?
हां। अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों से होने वाले शोर और आसपास के निवासियों की परेशानियों का मुद्दा उठाते हुए प्रदर्शन स्थल को दूसरी जगह स्थानांतरित करने की बात कही थी।
जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब क्षेत्र में प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध के खिलाफ फैसला दिया। हालांकि, अदालत ने प्रदर्शनों के तरीके, संख्या और नियमन को लेकर दिशा-निर्देशों की जरूरत भी मानी। <Cite refs={["turn316789search9"]}/>
इसलिए आज की बहस बिल्कुल नई नहीं है। फर्क यह है कि अब सुप्रीम कोर्ट के सामने एक बार फिर बेहतर सुविधाओं वाले वैकल्पिक स्थल की संभावना पर विचार हो रहा है।
अगर नया स्थल बना, तो क्या बदल सकता है?
अगर प्रशासन वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल निर्धारित करता है, तो उसका असर कई स्तरों पर हो सकता है।
मुद्दासंभावित प्रभाव
प्रदर्शनकारियों की सुविधाएं
पानी, शौचालय, चिकित्सा और अन्य बुनियादी इंतजाम बेहतर हो सकते हैं
सुरक्षा व्यवस्था
भीड़ प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं के लिए बेहतर योजना बनाई जा सकती है
आम लोगों की आवाजाही
यातायात और सार्वजनिक परिवहन में होने वाली बाधाओं को कम करने की कोशिश हो सकती है
प्रदर्शन की पहुंच
संसद और सरकारी कार्यालयों से दूरी बढ़ने पर मीडिया और राजनीतिक प्रतिक्रिया पर असर पड़ सकता है
लोकतांत्रिक अधिकार
अहम सवाल रहेगा कि नई व्यवस्था शांतिपूर्ण प्रदर्शन को व्यावहारिक रूप से कितना आसान बनाती है
ये संभावित प्रभाव हैं, किसी अंतिम सरकारी निर्णय का विवरण नहीं। वैकल्पिक स्थल की पहचान, उसकी स्थिति और वहां लागू होने वाले नियमों पर सक्षम अधिकारियों का फैसला महत्वपूर्ण होगा।
असली सवाल: सुविधा या आवाज उठाने की जगह?
जंतर-मंतर को लेकर बहस के दो पक्ष हैं। एक ओर, राजधानी में बड़े प्रदर्शनों के दौरान यातायात, सुरक्षा, आपातकालीन सेवाओं और स्थानीय निवासियों की परेशानियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं; संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत कानून के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
इसलिए किसी वैकल्पिक स्थल का मूल्यांकन केवल उसकी क्षमता या सुरक्षा व्यवस्था से नहीं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि वहां लोग अपनी बात कितनी प्रभावी ढंग से रख सकते हैं।
निष्कर्ष
जंतर-मंतर के भविष्य पर बहस दरअसल भारत में सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन की व्यवस्था पर व्यापक सवाल है। क्या राजधानी को ऐसा बेहतर स्थान मिल सकता है, जहां प्रदर्शनकारियों को बुनियादी सुविधाएं भी मिलें और आम नागरिकों की आवाजाही भी बाधित न हो?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस चर्चा को नई दिशा दी है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में समाप्त किया जा रहा है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है- अगर विरोध की जगह बदली जाती है, तो क्या लोगों की आवाज सरकार तक पहुंचाने का रास्ता उतना ही खुला रहेगा?





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