News Desk: आज अगर चाय वाले से लेकर बड़े शोरूम तक भुगतान करना हो, तो एक QR code स्कैन कीजिए और पैसा तुरंत पहुंच जाता है. बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के। लेकिन अब भारत के सबसे लोकप्रिय डिजिटल पेमेंट सिस्टम UPI के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, क्या इसे हमेशा मुफ्त रखा जा सकता है?
पूर्व NPCI अधिकारी संतानु पॉल ने एक मीडिया संस्थान से बातचीत में कहा है कि आम उपभोक्ताओं के लिए UPI को मुफ्त रखना जरूरी है। हालांकि, उनके मुताबिक लंबे समय तक इस विशाल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने के लिए एक टिकाऊ revenue model की जरूरत होगी।
UPI कितना बड़ा हो चुका है? आंकड़ा देखकर अंदाजा लगाइए
UPI ने जुलाई 2026 में नया रिकॉर्ड बनाया। NPCI के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ एक महीने में 23.66 अरब यानी 2,366 करोड़ transactions हुए और इनकी कुल value करीब ₹29.88 लाख करोड़ रही।
यानी औसतन हर दिन करोड़ों transactions सब्जी वाले के ₹50 से लेकर लाखों रुपये के बड़े merchant payments तक।
सरकार के मुताबिक FY 2025-26 में UPI का transaction value ₹314 लाख करोड़ से ज्यादा रहा और पिछले 10 वर्षों में transaction volume करीब 12,000 गुना बढ़ा है।
यही scale अब एक आर्थिक सवाल पैदा करता है- इतना बड़ा सिस्टम चलेगा कैसे?
‘फ्री’ है, लेकिन इसकी कीमत कोई तो चुका रहा है
UPI payment करने पर ग्राहक से कोई fee नहीं ली जाती। 2020 से merchant transactions पर भी Merchant Discount Rate यानी MDR को शून्य रखा गया, ताकि digital payments तेजी से फैल सकें।
लेकिन UPI को चलाने में बैंक, payment service providers, NPCI और apps की लागत आती है।
PwC के एक अनुमान के अनुसार FY 2023-24 में UPI Person-to-Merchant transactions को process करने की लागत करीब ₹12,000 करोड़ तक हो सकती थी, यदि औसत processing cost 0.25% मानी जाए।
यानी QR code पर ₹100 भेजना मुफ्त दिखता है, लेकिन उसके पीछे का infrastructure मुफ्त नहीं है।
फिर पैसा आएगा कहां से?
यहीं Merchant Discount Rate यानी MDR की बहस शुरू होती है।
हालिया सरकारी रुख के मुताबिक आम consumers और person-to-person payments पर कोई charge लगाने की योजना नहीं है। संभावित व्यवस्था में सिर्फ कुछ बड़े merchant transactions पर मामूली fee लगाने की संभावना है।
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक जिस मॉडल पर चर्चा हो रही है, उसमें ₹2,000 से ऊपर के कुछ merchant transactions और बड़े कारोबारियों को करीब 0.3%- 0.5% MDR के दायरे में लाया जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे transactions volume का केवल करीब 4% हो सकते हैं, लेकिन transaction value का लगभग 67% हिस्सा रखते हैं।
मतलब सरकार का संभावित logic साफ है- छोटे दुकानदार और आम ग्राहक सुरक्षित रहें, लेकिन बड़े merchants से digital infrastructure की लागत में योगदान लिया जाए।
लेकिन खतरा भी है
अगर बड़े merchants पर fee लगती है, तो सवाल उठेगा, क्या वे यह लागत ग्राहकों से वसूलेंगे?
दूसरी चिंता payment companies की है। UPI ecosystem में बड़े apps पहले से ही बहुत बड़ा market share रखते हैं। इसलिए fee structure ऐसा होना चाहिए जिससे छोटे players के लिए competition खत्म न हो और UPI की accessibility भी प्रभावित न हो। और Santanu Paul की सबसे बड़ी चिंता भी यही है कि UPI को अगले दशक में 5 गुना तक बढ़ाने के लिए sustainable business model जरूरी होगा।
तो क्या आपको UPI के लिए पैसे देने पड़ेंगे?
फिलहाल नहीं।
मौजूदा सरकारी आश्वासन के अनुसार consumers और छोटे merchants के लिए UPI free रहने वाला है। संभावित MDR व्यवस्था का लक्ष्य चुनिंदा बड़े merchant transactions हो सकते हैं।
लेकिन असली बहस “UPI free रहे या नहीं?” से आगे की है। क्योंकि UPI अब सिर्फ payment app नहीं रहा। यह भारत की digital public infrastructure बन चुका है।
23.66 अरब transactions और ₹29.88 लाख करोड़ का एक महीने का कारोबार दिखाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब इस invisible digital rail पर दौड़ रहा है।
इसलिए आगे की चुनौती होगी- UPI इतना सस्ता रहे कि आम आदमी की जेब पर बोझ न पड़े… और इतना sustainable भी रहे कि दुनिया का सबसे बड़ा real-time payment ecosystem लंबे समय तक चलता रहे।
यानी आने वाले समय में सवाल शायद यह नहीं होगा कि “UPI फ्री है या नहीं?”
बल्कि- “UPI की असली कीमत कौन चुकाएगा?”

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