नई दिल्ली/मक्का: पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति के बीच सऊदी अरब, तुर्किये (Turkey) और पाकिस्तान ने एक ऐतिहासिक 'मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यदि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। इस सामूहिक सुरक्षा (Collective Defence) व्यवस्था की तुलना कई विश्लेषक NATO के Article 5 से कर रहे हैं, हालांकि तीनों देशों ने स्पष्ट किया है कि यह किसी विशेष देश के खिलाफ बनाया गया सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को मजबूत करने का प्रयास है।
मक्का समझौता आखिर है क्या?
मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसके तहत तीनों देश रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करने, रक्षा तकनीक के विकास और किसी भी बाहरी सैन्य खतरे के समय समन्वित प्रतिक्रिया देने पर सहमत हुए हैं। हालांकि समझौते का पूरा आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है।
अभी इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया लगातार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। ईरान के साथ बढ़ते तनाव, यमन से हूती हमले, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा की चुनौतियां तथा क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन ने सऊदी अरब सहित कई देशों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका पर सुरक्षा निर्भरता कम करने और क्षेत्रीय स्तर पर एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार करने की रणनीति भी इस समझौते के पीछे एक बड़ा कारण है।
तीनों देशों की ताकत क्या है?
यह गठबंधन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि तीनों देश अलग-अलग क्षेत्रों में मजबूत क्षमता रखते हैं।
- सऊदी अरब पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसका रक्षा बजट दुनिया के सबसे बड़े रक्षा बजटों में गिना जाता है।
- तुर्किये तेजी से उभरती रक्षा तकनीक, ड्रोन उद्योग और NATO सदस्यता के कारण रणनीतिक महत्व रखता है।
- पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न देश है और उसके पास बड़ी तथा युद्ध-अनुभवी सेना है।
विश्लेषकों के अनुसार, इन तीनों की संयुक्त क्षमताएं क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।
भारत और दुनिया के लिए इसका क्या मतलब है?
हालांकि इस समझौते में किसी देश का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन इसकी घोषणा के बाद पूरी दुनिया की नजरें इस नए रणनीतिक समीकरण पर टिक गई हैं। ईरान ने इस पर आलोचनात्मक प्रतिक्रिया दी है, जबकि कई रक्षा विशेषज्ञ इसे पश्चिम एशिया में उभरते नए सुरक्षा ढांचे के रूप में देख रहे हैं। भारत के लिए भी यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि तीनों देशों के साथ उसके अलग-अलग सामरिक, आर्थिक और ऊर्जा संबंध हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इस गठबंधन की वास्तविक भूमिका इस बात पर निर्भर करेगी कि यह केवल रक्षा सहयोग तक सीमित रहता है या भविष्य में एक व्यापक सैन्य मंच का रूप लेता है।

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