News Desk: “वंदे मातरम्” महज दो शब्द, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में इनका वजन बेहद बड़ा है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में यह गीत राष्ट्रवादी भावना का प्रतीक बना। आज, करीब 150 साल बाद, यही गीत एक बार फिर राजनीति के केंद्र में है।
विवाद यह नहीं कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत है या नहीं। विवाद यह है कि इसे पूरा गाया जाए या केवल इसकी पहली दो कड़ियां?
कांग्रेस ने हाल ही में अपने कार्यक्रमों में सिर्फ पहली दो कड़ियां गाने की अपनी पुरानी परंपरा को फिर से स्पष्ट किया है। BJP इसका विरोध कर रही है और पूरे गीत के सम्मान की बात कर रही है।
लेकिन इस विवाद को समझने के लिए आज की राजनीति से करीब 89 साल पीछे, यानी 1937 में जाना होगा।
1875 में लिखा गया था ‘वंदे मातरम्’
वंदे मातरम् के रचयिता थे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय। इसे 1870 के दशक में लिखा गया और बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना का शक्तिशाली प्रतीक बन गया।
दिलचस्प बात यह है कि गीत के पहले दो छंद और बाद के छंदों का भाव एक जैसा नहीं है।
पहले दो छंदों में भारत की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली, नदियों, फसलों और मातृभूमि के प्रति प्रेम का वर्णन है।
लेकिन बाद के हिस्सों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवी-परंपरा से जुड़े धार्मिक प्रतीक आते हैं। यही आगे चलकर विवाद का कारण बना।
फिर 1937 में सिर्फ दो छंदों का फैसला क्यों हुआ?
1930 के दशक में कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने पूरे गीत के धार्मिक संदर्भों पर आपत्ति जताई।
कांग्रेस के सामने दुविधा थी- एक तरफ स्वतंत्रता आंदोलन का बेहद लोकप्रिय राष्ट्रवादी गीत, दूसरी तरफ ऐसा धार्मिक संदर्भ जिसे कुछ समुदाय अपने लिए सहज नहीं मानते थे।
अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने फैसला किया कि राष्ट्रीय और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सिर्फ पहले दो छंदों का इस्तेमाल किया जाएगा।
इस निर्णय के पीछे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं की सोच का भी प्रभाव था। उद्देश्य यह था कि गीत की राष्ट्रवादी भावना बनी रहे, लेकिन धार्मिक विवाद के कारण स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक एकता प्रभावित न हो।
यानी यह कोई अचानक किया गया बदलाव नहीं था।
1937 का फैसला सार्वजनिक और ऐतिहासिक रूप से दर्ज निर्णय था।
तो क्या कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ को छोटा कर दिया था?
यहीं से आज की राजनीतिक बहस शुरू होती है।
BJP का तर्क है कि वंदे मातरम् की ऐतिहासिक विरासत को उसके पूरे स्वरूप में सम्मान मिलना चाहिए। 2026 में BJP ने कांग्रेस के दो-छंद वाले फैसले की आलोचना करते हुए इस मुद्दे पर प्रस्ताव भी पारित किया है।
गृह मंत्री अमित शाह ने भी कांग्रेस पर तीखा हमला किया और आरोप लगाया कि उसने वंदे मातरम् को “दो टुकड़ों” में बांटा। दूसरी तरफ कांग्रेस का कहना है कि वह कोई नया फैसला नहीं कर रही, बल्कि 1937 की अपनी ऐतिहासिक परंपरा का पालन कर रही है।
2026 में विवाद फिर इतना बड़ा क्यों हो गया?
इस बार मामला सिर्फ पार्टी कार्यक्रम तक सीमित नहीं है।
केंद्र सरकार ने आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पूरे संस्करण को शामिल करने की दिशा में कदम उठाए हैं। साथ ही 2026 में इसे राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानूनी संरक्षण के दायरे में लाने को लेकर भी कदम उठाए गए हैं।
यानी एक तरफ सरकार और BJP पूरे गीत की ऐतिहासिक विरासत पर जोर दे रहे हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस पहले दो छंदों की समावेशी परंपरा का बचाव कर रही है।
लेकिन असली विवाद गीत से ज्यादा इतिहास की व्याख्या का है
एक पक्ष कहता है- “यह स्वतंत्रता संग्राम का गीत है, इसकी पूरी विरासत का सम्मान होना चाहिए।”
दूसरा पक्ष कहता है- “राष्ट्रीय प्रतीक ऐसा होना चाहिए जिसे हर भारतीय बिना धार्मिक असहजता के अपना सके।”
और यही वजह है कि वंदे मातरम् का विवाद सिर्फ गीत की लंबाई का विवाद नहीं है।
यह सवाल है- राष्ट्रवाद की परिभाषा क्या हो?
इतिहास को आज की राजनीति में कैसे पढ़ा जाए?
और राष्ट्रीय प्रतीकों में धार्मिक पहचान और राष्ट्रीय पहचान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
150 साल बाद भी ‘वंदे मातरम्’ क्यों प्रासंगिक है?
क्योंकि इस गीत ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में असाधारण भूमिका निभाई थी। 1950 में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि वंदे मातरम्, स्वतंत्रता आंदोलन में निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका के कारण, राष्ट्रीय गीत के रूप में वही सम्मान पाएगा जो राष्ट्रगान को प्राप्त है।
इसलिए आज की बहस को सिर्फ “दो छंद बनाम छह छंद” के रूप में देखना अधूरा होगा।
असल सवाल यह है कि क्या 1937 का समझौता आज भी प्रासंगिक है, या 2026 के भारत में राष्ट्रीय गीत की पूरी विरासत को नए तरीके से देखने का समय आ गया है?
और शायद यही कारण है कि लगभग डेढ़ सदी पुराना गीत आज भी भारतीय राजनीति में इतना शक्तिशाली है- क्योंकि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं… भारत के राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और इतिहास की व्याख्या के बीच चल रही बहस का आईना बन चुका है।




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