News Desk: लोकसभा सीटों के संभावित परिसीमन यानी Delimitation को लेकर तमिलनाडु ने एक बार फिर अपना रुख साफ कर दिया है। शनिवार को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की अध्यक्षता में हुई सांसदों की सर्वदलीय बैठक में शामिल नेताओं ने परिसीमन का विरोध करने और राज्य विधानसभा में इसके खिलाफ प्रस्ताव लाने पर सहमति जताई। बैठक में कुल 19 सांसद शामिल हुए। हालांकि राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी DMK ने बैठक का बहिष्कार किया।
लेकिन सवाल है- आखिर तमिलनाडु परिसीमन से इतना चिंतित क्यों है?
पहले समझिए: Delimitation है क्या?
सरल भाषा में परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का पुनर्गठन। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि लगभग समान संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व करे।
समस्या तब शुरू होती है जब जनसंख्या वृद्धि सभी राज्यों में एक जैसी नहीं होती।
तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कई राज्यों ने दशकों में जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करने में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। अब डर यह है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का बंटवारा ज्यादा आबादी वाले राज्यों के पक्ष में हुआ, तो दक्षिणी राज्यों की कुल सीटों में हिस्सेदारी घट सकती है, भले ही उनकी सीटों की वास्तविक संख्या कुछ बढ़ जाए।
39 सीटों का गणित इतना महत्वपूर्ण क्यों?
आज तमिलनाडु के पास लोकसभा की 39 सीटें हैं- 543 सदस्यीय सदन का लगभग 7.2%। 1971 के आसपास राज्य की जनसंख्या हिस्सेदारी और लोकसभा में उसकी हिस्सेदारी आज की तुलना में काफी करीब थी।
लेकिन पिछले पांच दशकों में तस्वीर बदल गई।
2011 की जनगणना के अनुसार तमिलनाडु की आबादी करीब 7.21 करोड़ थी। तुलना के लिए, उत्तर प्रदेश की आबादी करीब 19.98 करोड़ थी।
यही वह अंतर है जिसे परिसीमन की बहस में दक्षिणी राज्य सबसे ज्यादा रेखांकित कर रहे हैं।
एक अनुमान के मुताबिक, अगर मौजूदा 543 सीटों को ही रखा जाए और नई जनसंख्या के आधार पर सीटें बांटी जाएं, तो तमिलनाडु की सीटें 39 से घटकर करीब 30 हो सकती हैं। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश को मौजूदा 80 के मुकाबले लगभग 14 अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं।
हालांकि सीटों की वास्तविक संख्या किसी अंतिम परिसीमन प्रक्रिया के बिना तय नहीं की जा सकती।
विजय सरकार की मांग क्या है?
बैठक में शामिल दलों ने फिलहाल status quo बनाए रखने की मांग की है। The Quiver India के मुताबिक, सत्तारूढ़ गठबंधन लोकसभा की 543 और तमिलनाडु की 39 सीटों पर स्थायी रोक की मांग आगे बढ़ाएगा। नेताओं का तर्क है कि राज्य की संसदीय ताकत को कम करने वाला कोई बदलाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।
तमिलनाडु पहले भी मांग कर चुका है कि यदि लोकसभा का विस्तार किया जाता है, तो राज्य की मौजूदा हिस्सेदारी को सुरक्षित रखते हुए सीटें बढ़ाई जाएं। 2025 में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की सर्वदलीय बैठक में भी 1971 की जनसंख्या को आधार मानने और मौजूदा अनुपात को आगे बनाए रखने की मांग की गई थी।
लेकिन इस बार राजनीति भी दिलचस्प है
सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि DMK ने विजय की बैठक का बहिष्कार किया।
DMK नेता कनिमोझी ने विजय पर प्राथमिकताएं तय करने को लेकर सवाल उठाए और कर्नाटक के प्रस्तावित मेकेदाटु बांध के मुद्दे पर कार्रवाई की चुनौती दी। दूसरी तरफ विजय ने DMK के बैठक में शामिल न होने पर निराशा जताई।
यानी जिस मुद्दे पर तमिलनाडु के राजनीतिक दल सामान्यतः एक सुर में दिखाई देते हैं, उसी मुद्दे पर अब राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा भी सामने आ गई है।
क्या सच में तमिलनाडु की सीटें घटेंगी?
यहां एक जरूरी तथ्य समझना होगा- अभी कोई अंतिम परिसीमन फार्मूला घोषित नहीं हुआ है। The Quiver India की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने मौजूदा संसद सत्र में परिसीमन विधेयक लाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
इसलिए आज की स्थिति में “तमिलनाडु की सीटें घटना तय है” कहना सही नहीं होगा।
लेकिन असली चिंता सीटों की संख्या से ज्यादा राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव की हिस्सेदारी को लेकर है।
अगर किसी राज्य की सीटों का कुल लोकसभा में प्रतिशत घटता है, तो केंद्र में सरकार बनाने, गठबंधन बनाने और नीतिगत फैसलों पर उसका सापेक्ष राजनीतिक प्रभाव भी कम हो सकता है।
और यही वजह है कि तमिलनाडु की 39 सीटों की लड़ाई वास्तव में सिर्फ 39 सीटों की लड़ाई नहीं है।
यह सवाल है- क्या भारत में ज्यादा आबादी का मतलब ज्यादा राजनीतिक ताकत होगा, या उन राज्यों को भी राजनीतिक सुरक्षा मिलेगी जिन्होंने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्य में योगदान दिया?
यही बहस आने वाले वर्षों में उत्तर बनाम दक्षिण, प्रतिनिधित्व बनाम जनसंख्या और संघवाद बनाम बहुमत के बीच भारत की सबसे बड़ी संवैधानिक बहसों में से एक बन सकती है।




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