News Desk: हैदराबाद की NALSAR University of Law का विवाद अब सिर्फ एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह तक सीमित नहीं रहा। यह मामला सीधे छात्रों के विरोध के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानूनी पेशे में प्रवेश की निष्पक्षता से जुड़ गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने शुक्रवार को Bar Council of India (BCI) की उस कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई, जिसमें NALSAR के 2026 बैच के कानून स्नातकों के enrolment पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था।
विवाद की शुरुआत आखिर हुई कहां से?
NALSAR के कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय के आगामी convocation में CJI सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी। छात्रों का विरोध उन टिप्पणियों और न्यायिक रुख से जुड़ा बताया गया, जिन्हें उन्होंने छात्र आंदोलनों और पुलिस कार्रवाई के संदर्भ में असंतोषजनक माना। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 450 छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर मुख्य अतिथि के चयन पर पुनर्विचार की मांग की थी।
दिलचस्प बात यह है कि NALSAR के छात्र पहले भी सार्वजनिक मुद्दों पर शांतिपूर्ण विरोध दर्ज करा चुके हैं। जुलाई 2026 में विश्वविद्यालय के छात्रों ने NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक-meal solidarity fast भी किया था और सरकार से जवाबदेही की मांग की थी।
फिर BCI ने क्या किया?
विवाद बढ़ने के बाद BCI ने राज्य Bar Councils को निर्देश दिया कि NALSAR के 2026 बैच के छात्रों को advocate के रूप में enrol न किया जाए।
यानी जिस छात्र ने वर्षों की पढ़ाई पूरी की, उसकी डिग्री के बाद कानूनी पेशे में प्रवेश की प्रक्रिया ही रोकने की बात सामने आई।
यहीं से मामला बेहद गंभीर हो गया।
आलोचकों का सवाल था- अगर कुछ छात्रों ने विरोध किया भी था, तो पूरे batch को सामूहिक रूप से कैसे दंडित किया जा सकता है?
BCI ने बाद में अपना रुख बदला। revised communication में माना गया कि 2026 batch के अधिकांश छात्र विवाद में शामिल नहीं थे और उन्हें सामूहिक रूप से दंडित करना उचित नहीं होगा। इसके बाद छात्रों को enrolment का रास्ता खोल दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने BCI से पूछा- दखल क्यों?
शुक्रवार को CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने BCI के कदम पर कड़ी टिप्पणी की।
CJI ने सवाल उठाया कि यह मामला उनके और छात्रों के बीच संवाद का था, फिर BCI इसमें क्यों हस्तक्षेप कर रहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि छात्रों को कानून के दायरे में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने BCI के खिलाफ नोटिस जारी करते हुए उससे जवाब मांगा और NALSAR के छात्रों तथा faculty के खिलाफ punitive action पर रोक लगा दी।
यह मामला सिर्फ NALSAR का क्यों नहीं है?
भारत में बार काउंसिल ऑफ इंडिया legal profession के regulation में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए उसका किसी law graduate के professional enrolment को प्रभावित करने वाला फैसला सीधे उसके career पर असर डाल सकता है।
दूसरी तरफ, संविधान का Article 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और Article 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार सभा करने का अधिकार देता है, हालांकि ये अधिकार reasonable restrictions के अधीन हैं।
यही संतुलन इस मामले का केंद्र है- क्या किसी संस्था की गरिमा और अनुशासन की रक्षा के नाम पर छात्रों की असहमति को दबाया जा सकता है?
या फिर लोकतांत्रिक संस्थानों में असहमति को सुनना ही उनकी मजबूती है?
सबसे बड़ा सबक: कानून पढ़ने वाले छात्रों से असहमति का अधिकार क्यों छीना जाए?
NALSAR विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मामला उन छात्रों का है जो संविधान, मौलिक अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं का अध्ययन कर रहे हैं।
BCI की शुरुआती कार्रवाई ने जहां छात्र आंदोलन और professional consequences के बीच एक गंभीर सवाल खड़ा किया, वहीं सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया ने एक अलग संदेश दिया है- शांतिपूर्ण विरोध और असहमति अपने आप में अपराध नहीं हैं।
अब BCI को अदालत के सवालों का जवाब देना होगा और यह स्पष्ट करना होगा कि भविष्य में किसी पूरे academic batch को सामूहिक रूप से प्रभावित करने जैसी कार्रवाई का आधार क्या होगा।
क्योंकि NALSAR का सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कौन convocation में chief guest बनेगा।
असल सवाल है- क्या भारत के लोकतंत्र में छात्र सवाल पूछ सकते हैं, असहमति जता सकते हैं और बिना अपने करियर की कीमत चुकाए विरोध कर सकते हैं?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है- “शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने का अधिकार है… उसे सिर्फ असहमति के कारण नहीं छीना जा सकता।”





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