News Desk: अगर आपकी पसंदीदा कैन या बोतल पर कल “Energy Drink” लिखा दिखाई न दे, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसमें कैफीन अचानक गायब हो गया है। असली कहानी लेबल और regulatory classification की है। भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक FSSAI ने हाई-कैफीन वाले पेय पदार्थों पर “Energy Drink” या इसी तरह के descriptors के इस्तेमाल को हटाने का निर्देश दिया है। कंपनियों को इसके लिए 90 दिन का compliance window दिया गया है और अब regulator ने इसे एक साल तक बढ़ाने की कंपनियों की मांग भी ठुकरा दी है।
FSSAI को ‘Energy Drink’ शब्द से दिक्कत क्यों?
FSSAI का तर्क है कि भारतीय खाद्य मानकों में “energy drink” नाम की अलग regulatory category पर स्पष्ट standard मौजूद नहीं है। ऐसे में हाई-कैफीन पेय को इस नाम से बेचना या शरीर को “vitalize” करने अथवा “general weakness” में मदद करने जैसे दावे करना misleading हो सकता है। जुलाई में regulator ने कंपनियों को इस संबंध में notices जारी किए थे।
यानी मामला यह नहीं कि Red Bull, Sting या Monster को भारत में पीना बंद कर दिया गया है। सवाल यह है कि कंपनियां अपने उत्पादों को किस नाम और दावे के साथ बाजार में पेश कर सकती हैं।
90 दिन बनाम 1 साल- कंपनियों की परेशानी क्या है?
PepsiCo, Red Bull, Monster Beverage और Reliance जैसी कंपनियों ने compliance के लिए कम से कम एक साल का समय मांगा था। उनकी दलील है कि बाजार में पहले से लाखों कैन-बोतलें मौजूद हैं और कुछ imported packaging की खेप भी रास्ते में है। कंपनियों के लिए एक साथ packaging बदलना सिर्फ printing का नहीं, बल्कि inventory, supply chain, distribution और branding का भी बड़ा खर्च है।
लेकिन सरकार का कहना है कि राज्यों ने बताया है कि मौजूदा stock 60-90 दिनों में खत्म किया जा सकता है। इसलिए 90 दिन से ज्यादा की मोहलत देने का फिलहाल सवाल नहीं है।
इतना बड़ा मामला क्यों? आंकड़ा देखिए
भारत में energy-drink बाजार तेजी से बढ़ रहा है। Euromonitor के अनुसार retail sales करीब 12.6% सालाना की दर से बढ़ रही हैं—अमेरिका और चीन से भी तेज। 2025 में बिक्री का volume लगभग 907 million litres यानी करीब 90.7 करोड़ लीटर रहा, जिसे 3 अरब से अधिक bottles/cans के बराबर बताया गया है।
और 2028 तक इस बाजार का मूल्य करीब $1.6 billion यानी मौजूदा विनिमय दरों पर लगभग ₹14,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
यानी सरकार जिस शब्द को लेबल से हटाने की बात कर रही है, वह एक तेजी से बढ़ते अरबों डॉलर के बाजार की पूरी branding strategy का हिस्सा है।
Sting ने बदली पूरी मार्केट की कहानी
भारत में इस बाजार की रफ्तार को समझने के लिए 2017 का साल महत्वपूर्ण है, जब PepsiCo ने Sting लॉन्च किया। इसका ₹20 वाला छोटा pack खासकर 15-19 वर्ष के युवाओं और ग्रामीण बाजारों में लोकप्रिय हुआ। इसके बाद affordable high-caffeine beverages की पहुंच तेजी से बढ़ी।
यानी अब energy drink सिर्फ premium gym-goer का product नहीं रहा-यह छोटे शहरों, युवाओं और रोजमर्रा के कामगारों तक पहुंच चुका है।
स्वास्थ्य को लेकर चिंता भी बड़ी वजह
Energy drinks में caffeine के साथ sugar और taurine जैसे ingredients हो सकते हैं। दुनिया के कई regulators इनके सेवन, खासकर कम उम्र के लोगों में, को लेकर सतर्क हैं। ब्रिटेन में अगले साल अप्रैल से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए high-caffeine energy drinks पर प्रतिबंध लागू करने की योजना है।
अमेरिकी FDA के अनुसार energy drinks में caffeine की मात्रा brand और serving size के हिसाब से काफी बदल सकती है; कुछ products में 12-ounce serving में 246 mg तक caffeine हो सकता है। FDA यह भी बताता है कि अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के लिए कुल 400 mg caffeine प्रतिदिन सामान्यतः ऐसे स्तर पर माना जाता है जिससे नकारात्मक प्रभाव की संभावना कम रहती है, हालांकि व्यक्ति-व्यक्ति sensitivity अलग होती है।
अब अगला कदम क्या?
राजस्थान में पहले ही Sting, Campa Energy और Red Bull के हजारों products जब्त किए जा चुके हैं। लद्दाख में भी labeling compliance के लिए stock checks और seizure action की बात सामने आई है। Rajasthan ने e-commerce platforms को भी “energy drink” के रूप में ऐसे products के promotion को लेकर निर्देश दिए हैं।
इसलिए आने वाले 90 दिन beverage industry के लिए बेहद अहम हैं।
बोतल वही हो सकती है, स्वाद वही हो सकता है, caffeine भी वही हो सकता है—लेकिन पैकेट पर “Energy Drink” लिखना अब आसान नहीं रहेगा।
और इस पूरी लड़ाई का असली सवाल यही है-
क्या सरकार सिर्फ एक शब्द हटा रही है, या भारत में हाई-कैफीन पेय पदार्थों की marketing और consumer perception को पूरी तरह बदलने की तैयारी हो रही है?




Join the discussion
No comments yet — be the first to weigh in.